सामाजिक कुप्रथा : सुधारक प्रयास

कन्यादान एक एहन समस्या अछि जाहिसँ ने कोनो काल आ’ ने कोनो समाज अप्रभावित रहल अछि । राजा जनककेँ सेहो कन्यादानक समस्या भेल छलनि । मुदा, पहिने वरणक सुविधा छल जे सामाजिक, राजनैतिक आ’ ऐतिहासिक कारण सभसँ समाप्त भए गेल । समयक सङ्ग नव–नव समस्या उत्पन्न होअए लागल । ओहि समस्या सभमे प्रमुख अछि- बहुविवाह, अनमेल विवाह, बाल–विवाह एवं विवाहमे दहेज वा लेन–देन । दहेज एवं लेन–देनक समस्याक गर्भसँ एक और समस्या आधुनिक कालमे जनमल जे पकड़ुआ विवाह थिक । एहि विषय पर प्रस्‍तुत अछि सौ स बेसी किताबक संपादन क चुकल रमानंद झा रमन क इ महत्‍वपूर्ण आलेख जे अरुन्धती देवी लिखित एवं 1936 ई. मे प्रकाशित ‘मिथिलाक विदुषी महिला’क द्वितीय संस्करण 1912 ई. भूमिका थिक।

बहुविवाह

रामानंद झा रमण

मिथिलामे बहुविवाहक कारण पञ्जीप्रथाकेँ मानल जाइत अछि । एहि प्रथाक प्रारम्भक प्रसङ्ग मातान्तर अछि । किछु गोटे मिथिलाक महान दार्शनिक कुमारिल भट्टकृत ‘तन्त्रवार्तिक’मे उल्लिखित ‘समलेख्य’क विकसित रूप मानैत छथि । जखन अपन–अपन वंश–अभिलेखक रखबाक क्षमताक अभाव होअए लगलैक, एक सुयोग्य एवं सक्षम व्यक्तिकेँ तकर दायित्व देल गेलनि, ओएह व्यक्ति पञ्जीकार भेलाह । कारण जे हो, मुदा सम्प्रति पञ्ची–प्रबन्धकेँ मिथिलाक कर्णाटवंशी राजा हरिसिंह देवक (1307–1324 ई.) सङ्ग जोडि़ ओहिना देखल जाइछ, जेना बङ्गालमे कुलीन प्रथाकेँ बल्लाल सेनक सङ्ग जोडि़ देखल जाइत अछि । समाजक प्रमुख राजा होइत छलाह, तेँ पञ्जी प्रबन्धपर सेहो हुनक रुचि आ’ शासकीय प्रयोजनक प्रभाव पड़ैत रहल । मैथिल ब्राह्मण एवं कर्णकायस्थमे सांस्कृतिक समानता छल, एहि दूनू जातिक वैवाहिक सम्बन्ध अन्य क्षेत्रीय ब्राह्मण वा कायस्थक सङ्ग नहि होइत छलैक, तेँ एही दू जातिक पञ्जी–व्यवस्था विकसित भेल एवं अद्यावधि प्रभावी अछि ।

उपनिवेशवादी शासक अपन वर्चस्वक लेल ‘डिवाइड एवं रूल पालिसी’ अपनौलक । देशकेँ बंटलक । मिथिलाक परवर्ती राजालोकनि अपन वर्चस्वक लेल सामाजिक समरसताक सूतकेँ खींचि ब्राह्मण–समाजक विभाजन कएल । विभेदमूलक ई विभाजन सामाजिक असन्तोषक कारण बनल आ’ अद्यावधि ओहिसँ मुक्त नहि भेल अछि । कविवर सीताराम झा प्राय: ओही सामाजिक विकृतिकेँ  देखि लिखने छल होएताह– ‘पाँजिक गर्वपर माँजी जनौ, न पुनि आँजी–सिधी न सिखलौं ।’-उपदेशमाला (शान्तरस), पृ.सं.6, द्वतीय आवृत्ति, 1954 ई.

तथाकथित निम्नश्रेणीक बहुसंख्यक ब्राह्मण–समाजमे कतेको गोटे विद्यावन्त एवं श्रीसम्पन्न छलाह, तथापि सामाजिक जीवनमे ओ प्रतिष्ठा नहि छलनि, जे उच्चवर्गक अपाटहुकेँ प्राप्त छल । किन्तु आर्थिक सम्पन्नता अपन बाट ताकि लेलक । कहि सकैत छी जेना आइ–काल्हि श्रीसम्पन्न आ’ प्रभावशाली बापक बेटा पर्याप्त ‘डोनेशन’क बलपर नीकसँ नीक शिक्षण–संस्थानमे नामांकनमे सफल भए जाइछ, ओहिना उच्चश्रेणीक ब्राह्मणक सङ्ग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित भेलापर सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित कए लेबाक बाट प्रशस्त भए गेलैक । एहिसँ आर्थिक जगतक माङ्ग आ’ आपूर्ति सिद्धान्त सामाजिक जीवनमे फलित होअए लागल । ओसब दोसर, तेसर चारिमसँ पचास–साठि टा धरि विवाह कए अपन जातिकेँ भजबैत रहलाह । विवाह नहि बिकाए लगलाह । एहिसँ मैथिल ब्राह्मण समाजमे

एक नब वर्गक जन्म भेल । नामकरण भेलनि बिकौआ 

r. Jata Shankar Jha, ed. K.P. Jayaswal Commemoration Volume, – ‘An early attempt at Marriage Reform in Mithila, 1981, P. No. 534 – “At that time the Srotriyas and Yogas commanded great prestige. Even otherwise influencial, zamindars of the lower order of brahamans could not hope for such prestige. But money showed its power and gragually a way out was found. Now a brahaman of low order could also improve his position by matrimonial relationship with the members of the superior order. The affluent among them began to avail themselves of this facility for upgradation. But it soon created a somewhat competitive situation. Because of the great esteem in which the brahmans of high rank were held there were really very few of them who could be pursuaded to degrade themselves by contracting matrimonial relationship with low brahamans for the sake of such an undue prominence to those brahmans that they made marriage a profession. They came to be known as Bikauas that is purchasable. But they differed from the purchasable commodity in one respect. Even after receiving their price in full they were never under disposal of the purchasers. They sold themselves only for the marriage.”

बिकौआकेँने पत्नीक प्रति प्रेमभाव रहैत छलनि आ’ ने सन्तानक प्रति दायित्वबोघ । राजस्व कर्मचारी जकाँ सालमे एक बेर जाए ससुर अथवा पत्नीसँ कर ओसूलि अनैत छलाह । काज पड़लनि तँ ओहिमेसँ ककरो राखिओ लैत छलाह । अन्यथा, ओ आजीवन नैहरेमे रहैत छलथिन । एहनहि स्थितिमे लोक कहय लागल छल होएत, ‘जकरे सैं मानै, सेहे सोहागिनि ।’

अपना सबहक ओहिठाम एकटा कहबी छैक, ‘अगहनमे मूसोकेँ सात टा बौह’ । ई सम्पन्नताक द्योतक थिक । ब्राह्मण सबहक सम्पर्क सामान्यत: राजकुलसँ भए जाइत  छलनि । ओ अपन आश्रयदाताकेँ एकसँ बेसी पत्नीक सङ्गे सुखोपभोग करैत देखैत छलाह । रानीक सहचरीक रूपमे सैकड़हु ललित–लवङ्गी सब हुनक रनिवासमे रहैत छलथिन । सहज–जीवन आ’ उच्चविचारक मन्त्री अथवा राजपुरोति केँ आर्थिक सम्पन्नता तँ भइए जाइत छलनि, कतेक दिन अपन जीहकेँ जँतने रहितथि ।

बिकौआ प्रथाक मिथिलाक समाजपर प्रलयंकारी प्रभाव पड़लैक । एहि प्रभावक विस्तृत वर्णन जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनक रिपोर्टमे अछि ।

15th December, 1878 George Abraham Grierson, Sub-divisional Officer of Madhubani recorded about poligamy among the Maithil Brahmans – “Among Maithil Kulin Brahmans, those who go by the name of Bikaua marry 25 or 30 wives of a low family simply as a monetary speculations. They bring the first wife home and leave the others at their own house. Once a year or when convient they go on tour to their father-in-law’s houses and demand money from their wives or their (wives) parents, which they consider a laudable means of livelihood.

The most serious aspect of the system was that by the death of one Bikaua a large number of women became widows. An enquiry conducted by the Madhubani Sub-Anjuman in 1876, revealed that by the death of only 54

Bikauas as many as 665 women, some of tender age and others in the prime of life, has become widows. Since remarriage was prohibited they passed their lives ‘ cursing their husbands as well as their living parents. The case of two Bikauas has been specially mentioned in the proceedings – one of village Koilakh, aged about 50 years, who had married 35 wives the other of Ramnagar aged about 40 years, who had married 14 wives.”

एक बिकौआक मृत्युपर पचास धरि विभिन्न आयुवर्गक हुनक पत्नी विधवा भए जाइत छलथिन । आ’ हुनक जेठपुत्रकेँ विमाताक श्राद्धसँ स्वाच्छन्न नहि भेटैत छलनि ।

मनुस्मृतिमे बहुविवाह अनुचित मानल गेल अछि । एतेक धरि जे कोन–कोन परिस्थितिमे दोसर विवाह करबाक चाही तकरो विधान अछि । ओ कहैत अछि जे जाहि कुलमे नवविवाहिता कन्या अथवा पुतहु शोचमे हो, ओहि कुलक विनाश सुनिश्चित अछि, विनाशक कारण धनक्षय – राजकृत अथवा दैवकृत भए सकैत अछि । आ’ जतय ओ सुखी रहैत छथि, सभ क्षेत्रमे संवृद्धि होइत छैक ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशुतत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते ताद्सर्वदा । मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 57. याज्ञवल्क्यस्मृति सेहो बहुविवाहक सर्वथा प्रतिकूल अछि । किन्तु मिथिलाक पण्डित आ’ शास्त्रकार ब्राह्मण समाज बहुविवाह करैत–करबैत रहलाह । मिथिलाक समाजकेँ गर्तमे धकेलैत रहलाह ।

बहुविवाह: उन्मूलनक प्रयास

मिथिलामे प्रचलित बहुविवाह कुप्रथाक उन्मूलनक प्रयासकेँ चारि चरणमे बाँटि देखि सकैत छी –

  1. राजा माधव सिंहक प्रयास,
  2. मुंशी प्यारेलालक प्रयास,
  3. अखिल भारतीय मैथिल महासभाक प्रयास, एवं
  4. आधुनिक शिक्षाक प्रभाव ।
  5. राजा माधव सिंहक प्रयास

सामाजिक कुप्रथाक उन्मूलनक क्षेत्रमे आजीवन प्रयत्नशील राजा माधव सिंह (1775–1807 ई–) बहुविवाहपर कानूनी प्रतिबन्धक हेतु दिवानी अदालत, सरकार तिरहुतसँ अनुरोध कएल जे चारिसँ बेसी विवाहपर रोक लगा देल जाए ।

Seal of Qazi Mozaffar Ali

Goshwara                                                           Seal of Adalat

No. 10436                                                         Diwani Zila Tirhut

( Notification under the seal of Adalat Diwani, signed by the Judge in English character, Dist. Tirhut) Issued that the Vakil on behalf of Raja Madho Singh filed a petition to the Judge which revealed that Brahmans individually marry some fifty or sixty ladies and give them up at their respective native places. On account of excess in marriage they (brahamans) cannot manage for their maintenance. The ladies concerned, due to negligence and carelessness of their husbands, suffer a great of trouble and distress in their prestige and honour, and do not file their grievances in Adalat for redressals, it is proper  in every respect for the court to inflict condign penalty or punishment on them.

Hence, it is hereby notified to all the Brahamans and Panjiars of Sarkar Tirhut that they are prohibated to have more than four ladies in their matrimony. If it is known to the Government that the aforesaid Brahamans have done otherwise and get more than four ladies in marriage, they will be (penalized) for such heinouscrimes.

Dated the 26th August 1795 (5th Bhado 1200 f.)

हुनक तर्क छल जे एहिसँ समाजमे कुप्रथाजन्य विकृति पसरैत अछि । दिवानी जिला तिरहुत द्वारा 26 अगस्त 1795 ई– (5 भादो 1200 एफ–) केँ बहुविवाहक विरुद्ध आदेश पारित कए कहल गेल जे एहि आदेशक उल्लंघनकर्ताकेँ दण्डित कएल जाएत । किन्तु बिकौआ प्रथाक समर्थक अदालतक एहि आदेशपर कान–बात नहि देलनि । पुन: राजा माधव सिंह अदालतक समक्ष एहि समस्याकेँ आनल । सरकार तिरहुतक दिवानी अदालत 9 जुलाइ, 1798 ई. केँ पुन: आदेश कएलक । ओहिमे कहल गेल अछि जे एहि आदेशक उल्लंघन करताह एवं सिद्ध भए जाएत तँ कठोर दण्ड भेटतनि ।

Seal of Qazi Mozaffar Ali 1198 H

Goshwara                                                         Seal of Adalat Diwani

No. 10437                                                                  Zila Tirhut

A copy of promulgation sealed with Adalat Diwani under the signature of Judge, Zila Tirhut, in English character runs as follows:

That Dular Chand, Vakil on behalf of Raja Madho Singh, applied stating that the Brahamans of Sarkar Tirhut married individually some  forty, fifty and sixty ladies formerly and left their wives to their respective places and could not care for their maintenance due to excess in their marriage, so much so that they never took notice of their well-being and the ladies in question on account of inattention of their husbands suffered untold difficulties for subsistenance and led their lives in great miseries and that in order to maintain their honour and chastity, they did not put forth grievances against them in the court.

Consequently, since the time of the council, it had been decided that none should marry more than four ladies and the Panjiars who have been previously employed had already given their solemn engagement for the same, and it had remained sound and vital. In 1200 f. some of the Brahamans desired to have more than four ladies in their marriage. Thus order was issued by the Judge Mr. John Niff, on the petition filed by the Vakil of my client directing the Brahamans  to abide by the order  previously passed by the council.

Now, on the other hand although Kirti Nath Jha, resident of village Koilakh Pargana Bhaur, Chandradeva Jha, resident of village Singion Pargana Jarail and Dharmdhar Mishra of the said village Koilakh, Brahamans of Sarkar Tirhut have ……..already been forbidden by Adalat, they have not been moralized and turned to shameful remorse rather they have been defiant to do against the court. They are simply bent upon wedding more than the usaual custom and never abstain from it.

Hence, it is hereby notified that since the date of issue of this notification, the Brahamans or the Panjiars of Sarkar Tirhut are warned not to get more than four wives as being permissible. In case of ignoring this mandate, if any one would be found to have more than four wives and the court will be aware of this with genuine evidence, the life and property of the accused will be put into hazard and there will be no way to have rescue.

Dated 9th July,1798  AD.

Quoted in K.P. Jayaswal Commemoration Volume,1981, P.No.536

बहुविवाहक रोकबाक सम्बन्धमे राजा माधव सिंहक एहि प्रयासक प्रशंसा राजा राममोहन राय सेहो कएने छथि ।

Selected Works of Raja Ram Mohun Roy, Publication Division, Govt. of India, 1977 – “The horror of this practice(Poligamy) is so painful to the natural feelings of men that even Madhav Singh, the late Raja of Tirhoot (though a Brahman himself), through compassion, took upon himself (I am told) within the last half century, to limit Brahmans of his estate to four wives only.”

एहिसँ ई सिद्ध होइछ जे राजा राममोहन रायसँ पहिने विवाह सम्बन्धी सामाजिक कुप्रथाक उन्मूलनक प्रयास राजा माधव सिंह कएने छलाह ।

अठारहम शताब्दीक मिथिलामे सामाजिक सुधारक क्षेत्रमे एक और महत्त्वपूर्ण प्रयास भेल छल । मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रमे बसल सोति समाजक लोककेँ दरभंगाकेँ केन्द्रमे राखि बीस मीलक परिधिमे बसाएब । जे पछाति ‘सोतिपुरा’क नामसँ ख्यात भेल । सोति लोकनि अपन जातीय प्रधान दरभंगाक राजा–महराजाकेँ मानि लेल आ’ ओहो सोति समाजक खिआल राखय लगलाह । वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करबामे राजाक अनुमति आवश्यक कए देल गेलैक ।

Prof. Hetukar Jha, ed. Autobiograrhical Notes of Dr. Sir Ganganath Jha,Ganganath Jha Kendriya Sanskrit Vidyapeetha, Allahabad, 1976. P. 2 –  ” In the 18th century the Maharaja of Darbhanga brought together all those scattered (Srotriya) families and settled them in villages within a radious of about twenty miles in the district of Darbhanga, Darbhanga itself being the western most limit of this circle. Even since then there has been close relationship between the Maharaja of Darbhanga and these Srotiya families and no family was allowed by the Maharaja to suffer privation. In consideration of this, the Srotriyas acknowledged the Maharaja as the head of their clan and even today no marriage is performed among Srotriyas without the written permission of the Maharajadhiraj of Darbhanga.”…………….

ई अनुमति पञ्जीकारक प्रमाणपत्रपर देल जाइत छल जे दरभंगाक अन्तिम महाराज कामेश्वर सिंहक जीवन–काल (1907 1962 ई.) धरि प्रभावी रहल । एहि अनुमतिक नामकरण भेल ‘परमानगी’ । एहि व्यवस्थासँ एकपत्नीव्रती तँ नहि, मुदा अनुमत सीमाक उल्लंघन अवश्य थम्हि गेलैक । ‘बिकाएब’क अर्थ बहुविवाह नहि रहल, अर्थलाभसँ प्रेरित भए तथाकथित निम्न श्रेणीक लक्ष्मीपुत्रक सङ्ग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कए घरजमाय बनब भए गेल । सोतिपुराक आन–आन गामक की स्थिति छल से तँ अनुसन्धान  सापेक्ष अछि, मुदा बीसम शताब्दीमे हमरहि गामक अयाचीक दू वंशजक वैवाहिक सम्बन्ध पूर्णियाक राजपरिवारमे भेल छलनि । ओहिमे एकक सन्तानमे मैथिलीक सुविख्यात लेखिका श्रीमती लिली रे छथि ।

एहि व्यवस्थाक गर्भसँ किछु एहन विकृति  एवं समस्या सभ जनमल जे समाजकेँग्रसित कएने रहल । ओहिमे प्रमुख अछि –

  1. सोतिपुरा बसौल गेलापर अधिकांश लोक कोशीक पूबसँ आनल गेल छलाह । एहि हेतु सम्भवत: सोतिसभक लेल ‘पूबारिपार’ आ’ शेष मैथिल ब्राह्मणक लेल ‘पछबारिपार’ सन विभेदक वर्गीकरण कएल गेल । ई विभाजन सामाजिक दूरत्व बढ़ेबामे सहायक भेल ।
  2. जेना सम्प्रति मन्त्री/अधिकारीक सम्बन्धी/समीपी लोक अपनाकेँ असामान्य श्रेणीक नागरिक मानय लगैछ, ओहिना राजदरभंगाक समीपी होएबाक अहंभावमे ओङठल सोतिसमाज बह्ममोत्तर भोगैत ‘आलस्यदेव’क उपासक बनि गेल ।
  3. एहि व्यवस्थाक शीर्षपर राजदरभंगा छल, तेँ ‘बारब’ एवं ‘उठाएब’ अथवा अपन विरोधीकेँ मानसिक यातनाक लेल, एक सामाजिक अस्त्रक रूपमे ‘परमानगी’क प्रयोग, एक सामान्य बात भए गेल छलैक ।

मुंशी प्यारे लालक प्रयास

शाहाबाद निवासी मुंशी प्यारेलाल सरकारी नोकरी छोडि़ पहिने अपन समाजमे व्याप्त वैवाहिक कुप्रथाक निराकरणक हेतु आन्दोलन आरम्भ कएल । हुनक ई आन्दोलन ततेक लोकप्रिय भेलैक जे अङरेज सरकारक सहयोग पाबि अर्द्धसरकारी भए गेल । बिहारक विभिन्न जिलामे शाखा खोलल गेलैक । दरभंगामे स्थापित शाखाकेँ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक पूर्ण सहयोग भेटल । हुनक दूनू काकाजी महाराज कुमार गुणेश्वर सिंह एवं महाराज कुमार गोपेश्वर सिंह ओहि समितिक सदस्य बनौल गेलाह । ‘मधुबनी विवाह समिति’क नामसँ ख्यात मुंशी प्यारे लालक सुधार आन्दोलनक मुख्य दू टा बिन्दु छलैक –

  1. विवाहमे खर्च कम करब, तथा
  2. मैथिल ब्राह्मणमे बहुविवाहकेँ रोकब ।

मधुबनीक तात्कालिक एस.डी.ओ.जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनक अध्यक्षतामे 15 दिसम्बर, 1878 ई– केँ भेल बैसारक रिपोर्टक  अनुसार निम्नलिखित बिन्दुपर चर्चा भेल (डॉ. जटाशंकर झा, मिथिलामे कन्यादानक समस्या, मिथिला भारती, अंक 1, भाग 1-2 मार्च-जुन 1969 ई.)–

  1. कन्याक विवाहमे टाकाक माङ,
  2. विवाहक हेतु कन्याक बिक्रय,
  3. एक बिकौआक मृत्युपर हुनक अनेक पत्नीक आजीवन दारुण वैधव्य,
  4. माता–पिताक विपन्नताक कारण छोट कन्याक वृद्ध अथवा अपङ्गक सङ्ग विवाह,
  5. कन्या भ्रूणहत्या,
  6. कन्याक विवाहमे विलम्बसँ अनाचारक सम्भावना, एवं
  7. विवाहमे कर्ज ।

व्यापक दृष्टिक ‘मधुबनी विवाह समिति’क सदस्य सभाक समय सौराठ जाए पूर्ण जाँचक उपरान्त विवाहक अनुमति प्रदान करैत छलाह । पञ्जीकारकेँ स्पष्ट आदेश छल जे बहुविवाहीकेँ अनुमति प्रदान नहि करथि । किछुकेँ दण्डित सेहो कएल गेल । कन्यागत एवं वरागत द्वारा कएल गेल खर्चक जाँच समितिक सदस्य करब आरम्भ कएल तँ खर्चकेँ  नुकेबाक यत्न होअए लागल । किछु गोटे मुंशी प्यारे लालक नेतृत्वपर हुनक सामाजिक स्तरक दृष्टिसँ शंका कएल । मुंशी प्यारेलाल एवं महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक देहावसानक उपरान्त एहि आन्दोलनक प्रभाव क्रमश:  शिथिल होइत गेल ।

राजा माधव सिंह अथवा मुंशी प्यारेलालक  प्रयासकेँ पूर्ण सफलता नहि भेटबाक इहो कारण भेल होएत जे मिथिलाक राजा/महाराजा अथवा हुनकर कुल वा सम्बन्धीवर्गक लोक अपन व्यक्तिगत जीवनमे एकपत्नीव्रती नहि छलाह । प्राय: अधिकांशकेँ दू विवाह अवश्य छलनि । अबू फजल लिखने छथि जे राजाकेँ छोडि़, पहिल स्त्रीक जीवित रहैत दोसर विवाह नहि करबाक चाही-

Abu Fazal- Excepting the king, it is not considered right for a man to have more than one wife unless the first wife is sickly or proves barren, or her children die. In these cases he may marry ten wives, but it the tenth proves defective, he may not marry again. If the first wife is unsuitable, and he desires to take another, he must give the first a third part of his estate.”- Quoted by Dr. Jata Shankar Jha, K.P. Jayaswal Commemoration Volume, P. No. 534.

से प्राय: मिथिलाक सभ सुखी–सम्पन्न लोक अपना केँ राजा मानि लेने छलाह । तथापि, जेना जॉन बिम्स अपन संस्मरणमे लिखने छथि जे उत्कलक एक राजा प्रत्येक वर्ष एक विशेष अवसर पर विवाह करैत छलाह, एवं साठिक उपर विभिन्न आयुवर्गक रानी छलथिन, से स्थिति तँ मिथिलामे नहि छल ।

John Beames, Memoirs of a Bengal Civilian, Eland, London, Page No. 246 – “On enquiry I learnt that there was an ancient custom, half religious and half traditional, by which the Maharajas of AI were required to marry a new wife every year on a certain festival. The present Maharaja, being nearly seventy and having begun life early, as they do in India, had by degrees amassed all these wives and had forgotten all these children. What was to become of them all, no one seemed to know or care.

अखिल भारतीय मैथिल महासभाक प्रयास

मिथिलामे जातीय संगठनक महत्त्व नहि छल । उनैसम शताब्दीक अन्तिम पहरमे जखन राष्ट्रीय क्षितिजपर सुधारवादी आन्दोलनक सङ्ग जातिवादी संगठन बनय लागल आ’ 1909 ई. मे महाराज रमेश्वर सिंह लाहौरमे आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभाक सभापतित्वक बाद देश आपस अएलाह तँ अखिल भारतीय मैथिल महासभाक स्थापनाक विचार भेलनि । एहि प्रसङ्ग मन्त्रणा कएल आ’ निर्णय भेल जे मैथिल ब्राह्मण एवं कर्णकायस्थ जे भिन्न जातिक (जेना कान्यकुब्ज, शाकद्विपीय वा गौड़ ब्राह्मण अथवा अम्बष्ठ, श्रीवास्तव आदि कायस्थ) ब्राह्मण एवं कायस्थक सङ्ग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहि करैत छलाह, तेँ सांस्कृतिक समानाताकेँ देखैत एहि दूनू जातिक एक अखिल भारतीय संस्थाक गठन कएल जाए । एकर लक्ष्य निर्धारित करबाक हेतु गाम–गाममे जे सभा कएल गेल, तकर मूल विषय सामाजिक दुर्गुण निवारण रहैत छल । ओहूमे वैवाहिक समस्या मुख्य छलैक । महासभाक पहिल अधिवेशन महाराज रमेश्वर सिंहक अध्यक्षतामे 26 मार्च, 1910 ई. केँ मधुबनीमे भेल । सामाजिक दुर्गुण–निवारणक हेतु ‘नओ सूत्री’ मार्गदर्शन पारित भेल ।

मिथिलामोद, उद्गार 42, वाराणसी, चैत्र, 1317 साल/1910 ई. – नव सूत्री मार्गदर्शन -1. राजभक्ति, 2. सदाचार, 3. विद्या–प्रचार,4. कृषि–वाणिज्य, 5. व्यर्थ–विरोध–परिहार,  6. विवाहादि  सामाजिक  दोषनिवारण,  मितव्यता,  7. शारीरिक उन्नति, 8. मिथिला की सत्त्व–रक्षा, एवं 9. मिथिला, मैथिल, मैथिलीक हित–साधन ।

ताधरि मुद्रणक सुविधा भए गेल छलैक एवं मैथिलीमे अनेक पत्रिका प्रकाशित होअए लागल छल । लेखक लोकनिसँ अनुरोध कएल गेल जे तदनुकूल साहित्यक सर्जना करथि । एहिसँ बहुविवाहक विरुद्ध मानसिकताक निर्माणमे अनुकूल प्रभाव पड़ए लागल । उदाहरण अछि ‘मिथिला मिहिर (23 July 1927)’मे प्रकाशित एक रिपोर्ट, जकर शीर्षक छैक ‘गत सौराठ सभा’ । एहि रिपोर्टमे उल्लंघनकर्ता पर कोन तरहेँ प्रहार कएल गेल, जे द्रष्टव्य अछि –

1.एहि सङ्ग एक लज्जाक विषय जे बहुतो लोक हमरा सबहिकेँ उपालम्भ ओ हास्य करैत छलाह – जे परोपदेशेपाण्डित्य- अहाँ सभैक नेता बाबू बदरीनारायण उपाधयाय स्त्री, पुत्र, जमाय, दौहित्र, दौहित्रीपुत्र रहैत पुन: भरामक श्रीकारी ठाकुरक कन्यासँ विवाह कयलन्हि अछि- इत्यादि वास्तव ई निन्दास्पद विषय सूनि ग्लानि होइ छल- साध्य की ? अस्तु उपाध्ययक एहि आचरणसँ हुनक जमाय श्री चन्द्रभूषण बाबू वकीलक गत वर्षक विवाहजन्य अपयश परिमार्जित भए गेल ।

  1. एक अभिनव विषय पश्चात ज्ञात भेल जे मानेचैकक प्रसिद्ध पण्डित श्रीमधुसूदन झाक बालक अपन सारिसँ पाली गाँवमे विवाह कयलन्हि, जखन पहिल स्त्री जीविता छथिन्ह । एकर आन्दोलन ओहि प्रान्तमे अछि । पण्डित लोकनि एहि गम्भीर विषयपर समुचित विचार–प्रकाश करथि ।

3.खेदक विषय जे भागलपुर तथा पूर्णिया जिलाक कतोक व्यापक वंशावतंश आबहु बिकौआसँ सम्बन्ध करब नहि छाड़ल अछि । ताहू सँ भयावह तँ अङरेजी शिक्षित ओ अर्द्धशिक्षित नवयुवक सभैक हजार दू हजार दाबी ।

आधुनिक शिक्षाक प्रभाव

बहुविवाहकेँ रोकबामे आधुनिक शिक्षाक  महत्त्वपूर्ण हाथ छैक । मिथिलाक युवावर्गक परिचय आन–आनक समाजक लोकसँ भेल । एहिसँ दृष्टि व्यापक भेलनि । मिथिलाक एहन सामाजिक दुर्गुणक चर्चापर ग्लानिबोध होनि । बहुविवाहीकेँ लोक घृणाक दृष्टिसँ देखए लागल ।

बालविवाह

मैथिल ब्राह्मणमे बालविवाह सामान्य बात छल । विवाहक लेल कन्याक आदर्श आयु दश वर्ष छल । ओहिसँ बेसी होइतहि  अज्जगि’क उपाधि भेटि जाइत छलनि ।  बेटाक विवाहक बन्धन उपनयन छल । से होइतहिं माइ–बापकेँ पुतहुक मनोरथ तीव्र भए जाइत छलनि । विवाह की होइत अछि ? ओकर कोन सामाजिक प्रयोजन छैक, ने शारीरिक रूपसँ आ’ ने मानसिक रूपसँ भिज्ञ रहैत छल । मुदा, माइ–बापक मनोरथ पूरा भए जाइत छल ।

Dr. Jata Shankar Jha, Aspects of the History of Modern Bihar, K.P.Jayaswal Research Institute, Patna,1988 – ‘Besides Sati and Poligamy, there were a number of other evils connected with Hindu marriage in Bihar, such as extravagant expenses in marriages, child marriage, unequal marriages, that is, the practice of marrying girls of tender age to an old, infirm and useless man owing to the proverty of the bride’s parents etc.

एकर दुष्परिणाम भोगैत छलीह कन्या लोकनि । जँ दुर्भाग्यवश विधावा भए गेलीह तँ पूरा जीवन दुखोदधिमे आकण्ठ डूबल रहि जाइत छलनि । आनक कोन कथा अपनहु भाए–बहिनिक माङ्गलिक काजक अवसरपर हुनक उपस्थिति अशुभ भए जाइत छल । पण्डित गिरीन्द्रमोहन मिश्र (बाल-विवाह, मिथिलामिहिर,  प्रकाश 1, मण्डल 1, 1909ई. ) लिखने छथि- ‘एहिठाम विद्या, शारीरिक स्वास्थ्य, आ’ वयसक गणना नहि कएल जाइत अछि । एहिठाम महादेव झा आ’ श्रीकान्त झाक चलती अछि, भलहि वर दश वर्षक होथि वा कन्या पाँच वर्षक तकर कोनो चिन्ता नहि, भलहि वरक शरीर रोग जर्जर हो, वा मूर्खाधिराज रहथि, एहिसँ कोनो मतलब नहि, किछु हो पञ्जीक विचार जरूरी, परमावश्यक । चौदह-चौदह वर्षक बालकक दू–दू टा विवाह भेटि जाएत । फ्रांसिस बुकानन सेहो अपन रिपोर्टमे लिखने छथि जे दन्तहीन, आ’ मरणासन्न व्यक्ति सेहो कम आयुक कन्यासँ विवाह कए लैत छथि ।

Francis Buchanan, An Account of the District of Purnea (1809-10). Quoted in Aspect of the History of Modern Bihar, by Dr. Jata Shankar Jha, 1988. – “a man of high rank is often hired when toothless or even moribund, to marry a low child, who is afterwards left wodow, incapable of marriage, for the sake of raising her father’s family….”

मिथिलामे बालविवाहक सम्बन्धमे दू टा घटनाक उल्लेख करए चाहब । ई दूनू घटना मैथिलीक लेखिकासँ सम्बन्धित अछि । पहिल छथि मिथिलाक विदुषी महिला हरिलता (मोदवती, देखू पृ–सं– 70) आ’ दोसर छथि ‘मिथिलाक विदुषी महिला’क लेखिका अरुन्धती देवी स्वयं ।

एहिमे पहिल घटना हमर घरक थिक आ’ दोसर घटना हमर गामक । हमर पितामह अपन कन्याक विवाह सात वर्षक अवस्थामे मिथिलाक राजकुल, खण्डवला कुलमे कएल । राजकुलक परम्पराक अनुसार ओ बेदीएपरसँ सासुर चलि गेलीह । विवाहक वाद विशेष अवसरहिपर बेसीसँ बेसी भरि दिनक लेल नैहरमे रहि सकैत छलीह । आगमनसँ पहिने डेउढ़ीसँ लाम-लस्कर राजसी व्यवस्थाक हेतु अबैत छल । सामाजिक प्रथाक अनुसार हमर पितामही बेटीक सासुर माङ्गलिक अवसरक बादहि जाए सकैत छलीह । सात वर्षक बालिका–बधूक माइसँ भेंट दुर्लभ छल । अन्तत: सकरी स्टेशनक उत्तर सड़कक पूब आवश्यक सुविधासँ युक्त एक परिसरक निर्माण कराओल गेल । जतय समय-समयपर माइ-धीक भेंट होइत छल । एक पुत्रक जन्मक बाद मात्र सोलह वर्षक अवस्थामे मोदवती विधवा भए गेलीह । हुनकामे पढ़बाक अदम्य आकांक्षा छल । किन्तु तकर अनुमति नहि छलैक । तथापि, ओ विश्वस्त लोकक माध्यमेँ मुंशीजीसँ वर्णमाला लिखाए, डेओढ़ीक बाड़ीक गाछतर बनल चबूतरापर चोराकेँ माटिसँ अक्षर सीखय लगलीह । जखने कोनो खबासिनि देखि लेनि आ’ सासुकेँ कहि देबाक धमकी देनि तँ वर्णमाला फाडि़ फेकि देथि । ई क्रम चलैत रहल । पछाति ओ स्वाध्यायसँ शास्त्रज्ञ भए गेलीह । शास्त्र–पुराण बांचथि । पतरा देखथि । गणना कए दिन ताकथि । ससुरक देहान्त आ’ पुत्रक बालिग होएबा धरि जमिन्दारीक प्रबन्ध स्वयं देखैत रहलीह । ओ 66 वर्ष धरि वैधव्य जीवन व्यतीत कए 1985 ई. मे शिवत्वकेँ प्राप्त कएल । मिथिलाक राजकुल आ’ अपन पाण्डित्य परम्पराक लेल ख्यात उच्च ब्राह्मण कुलक ई त्रासद उदाहरण थिक ।

मोदवती प्राचीन परिपाटीक संस्कृत विद्वानक कन्या छलीह । किन्तु बालविवाहक दुष्परिणाकेँ भोगनिहारि अरुन्धती देवीक लालन–पालन पाश्चात्य शिक्षा–प्रणालीक अधीत विद्वानक परिवारमे भेल छलनि । म.म. डा. सर गङ्गानाथ झाक दौहित्री एवं शिक्षाविद डा. अमरनाथ झाक भगिनी अरुन्धती देवीक लालन–पालन इलाहाबादमे भेलनि तथापि, ओ कहिओ स्कूल नहि पठाओल गेलीह । नओ वर्षक अवस्थामे विवाह, बारह वर्षक अवस्थामे द्विरागमन एवं बीस वर्षक अवस्थामे तीन सन्तानकेँ मातृहीन कए, पञ्चत्वमे विलीन भए गेलीह ।

मिथिलाक ब्राह्मणेतर, तथाकथित निम्नवर्गहुमे बालविवाहक प्रथा छल, मुदा विधवा विवाह अथवा एककेँ छोडि़ दोसरसँ सम्बन्ध कए लेब सामाजिक रूपसँ वर्जित नहि छलैक । बालविवाहक प्रथा स्वतन्त्रताक पछातिओ लगभग दू दशक धरि जीवित छल ।

कन्यादान सामान्यत: सातसँ बारह वर्षक अपरिवक्व अवस्थामे भए जाइत छलैक ।  एहि हेतु एक रस्ता ताकल गेल जाहिसँ सासुर जएबासँ पहिने किछु प्रौढ़ता आबि जाइनि । एहि हेतु द्विरागमनक समय पहिने विवाहसँ पाँच वर्ष छल । ई अवधि घटय लागल । तीन वर्ष, एक वर्षसँ घटैत–घटैत, जेना–जेना कन्यादानक  लेल कन्याक आयु बढ़ैत गेल, द्विरागमनक अवधि कमैत गेल अछि । सम्प्रति बेसीठाम मण्डपहिपरसँ कन्या बिदा भए जाइत छथि । एहिसँ दूनू पक्षकेँ सुविधा होअए लगलैक अछि । तथापि, किछु एहन लोक औखन छथि जे कन्याक चतुर्थी अपनहि ओहिठाम सम्पन्न कराबए चाहैत छथि । एहिसँ प्रवासीकेँ अथवा जे उपटिकेँ कन्यादान करैत छथि, बेसी असुविधा एवं व्यय–वहन करए पड़ैत छनि ।

बालविवाहकेँ रोकबाक प्रयास

जखन कालपूर्व सहवास (Premature Consumation )क कारणेँ बंगालमे दशवर्षीय फूलमणि देवीक देहान्त भए गेलैक आ’ ओकर पतिकेँ दण्डित करबा लेल सरकारक समक्ष कोनो कानूनी अधिकार नहि छल, तखन 1890 ई– मे Supreme Legislative Council मे The Age of Consent Bill  आनल गेल । प्रस्तावित बिलक अनुसार बारह वर्षसँ कम आयुक पत्नीक सङ्ग सहवास दण्डनीय अपराध छल । बिलमे इहो प्रावधान कएल गेल जे बालिग भेलापर ओ विवाह–विच्छेद कए सकैत अछि । सदनक भीतर एवं बाहर एकर घोर विरोध भेलैक । बिलक विरोधीक तर्क छलनि जे एहिसँ पुलिसक हस्तक्षेप बढ़त एवं डाक्टरी जाँचसँ सामाजिक प्रतिष्ठापर आघात होएतैक । बिलक विरोधमे बालगङ्गाधर तिलक, एवं अन्य काँग्रेसी नेता तथा पक्षमे महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह, दुर्गाचरण लॉ, पी– सी– मजुमदार, डा– रासबिहारी बोस आदि छलाह । बिल यद्यपि पारित भए गेल मुदा विरोध होइत रहल । एहि सन्दर्भमे जखन शारदा एक्ट पास भेलैक, The Age of Consent Bill क प्रावधान केँ बल भेटल । सङ्गहि, ताधरि आधुनिक शिक्षाक प्रचार–प्रसाक सङ्ग लोकक मानसिकतामे सेहो परिवर्तन आबए लागल छल – Dr. Jata Shankar Jha, Aspects of the History of Modern Bihar, P.N.68, K.P.Jayaswal Research Institute, Patna, 1988 – “Its chief proposals were that intercourse with wife under 12 years of age should be made penal and in cases of infant marriage, the bride should be entitled to repudiate the marriage, if she so desired on attaining majority. The Bill provoked strong opposition both in he Council and outside.”

विधवा विवाह

राजा राममोहन राय एवं ईश्वरचन्द्र विद्यासागरक प्रयाससँ जखन विधवा विवाह कानून बनेबाक प्रस्ताव आएल तँ एकर घोर विरोध भेलैक । पटनासँ प्रकाशित एक पत्र पहिल मइ, 1855 ई–क संस्करणमे ओ लिखलक –‘हिन्दू औरतों का दूसरा निकाह ।’ एहि प्रस्तावक विरोधमे प्रबुद्ध नागरिकलोकनि ज्ञापन देलथिन । तथापि, Widow Remarriage Act XV of  1856 पारित भए गेल । बङ्गाल जकाँ मिथिलामे बह्मसमाजक कोनो प्रभाव नहि छल । मिथिलाक उच्चवर्गमे विधवा विवाह मान्य नहि छल । फ्रांसिस बुकाननक अनुसार तीन चैथाइ विधवा पुनर्विवाहक आयुमे छलीह । हुनक रिपोर्टक अनुसार उच्च वर्गक विधवाकेँ अत्यन्त साधारण जीवन व्यतीत करए पड़ैत छलनि । विधवाक  समस्या देशक अन्यो प्रान्तमे छल । किन्तु ओहिठामक समाज संवेदनशील छल, मिथिलामे विधवाक  प्रति समाज संवेदनशील नहि छल । पूनामे विधवालोकनिक लेल ‘शरदा सदनक स्थापना 1892 ई– मे भए गेल छलैक । ओतय हुनकालोकनिकेँ आत्मनिर्भर बनबाक शिक्षा देल जाइत छलनि- Minna G. Cowan, Education of Women of India, 1912, P. N0.181.-“Since the Sharda Sadan (the abode of wisdom) near Poona was started in 1892, thousands of Indian widows have been given the opportunity of a self-supporting, self-respecting life, and a vision of what self-sacrifice may mean.”

मिथिलामे एहन कोनो संस्था वा सदन नहि छल । आश्रयहीन विधवा विश्वनाथक शरणमे काशी चल जाइत छलीह । हँ, जखन महात्मा गाँधीक नेतृत्वमे स्वदेशी आन्दोलनक सङ्ग चर्खाक प्रचार–प्रसार होअए लागल तँ विधवा ब्राह्मणी लोकनिकेँ आर्थिक लाभ जे किछु भेल होनि, अनमनाक अवसर अवश्य किछु भेटि गेलनि ।

अनमेल विवाह

अनमेल विवाहक मूल कारण माइ–बापक आर्थिक विपन्नता छल । सामाजिक मान्यता एवं शास्त्रीय मर्यादामे आवद्ध कन्याक पिता अपन तुरिआक जमाय अनबामे ग्लानिक अनुभव नहि करैत छलाह । ओ ई नहि सोचैत छलाह जे वृद्ध एवं रुग्णपतिक मृत्यूपरान्त हुनक अबोध कन्याक कोन हाल भए जएतनि! शास्त्र कहैत छलनि जे पहिने वरक स्वास्थ्य आ’ सुन्दरता देखी, कुल–शील बादमे देखबाक चाही (आदौतात वरं पश्य, पश्चात् कुल शीलयो:) । मुदा, अपन स्वार्थक समक्ष सबटा बिसरा जाइत छलनि । मैथिली लोकगीतमे पिताक लोभग्रस्ता देखि बेटी उलहन दैत छैक जे ओ लोभवश हमरा अपन घरसँ बाहर करए चाहैत छथि –

कओन गामक सिनुरहारा, सिन्दुर बेचय आएल हे ।

आहे, कओन गामक नबे कामिनि, सिन्दुर बेसाहल हे ।

केहन निरदय भेल बाबा, धनहिं लोभायल हे ।

एक रे सिन्दुरवा के कारण घरसँ निकालल हे ।- मैथिली संस्कार गीत, पृ–सं– 196, राष्टभाषा परिषद, पटना

बहुविवाहक सम्बन्धमे जेना विस्तृत विवरण महाराज माधव सिंहक अनुरोधपर निर्गत अदालती आदेश अथवा जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनक रिपोर्टमे अछि, ओहने अनमेल विवाहक प्रसङ्ग एक विस्तृत विवरण ‘मिथिला’51मे प्रकाशित अछि । ओ राँटी–मंगरौनीक मदन उपाध्यायक  वंशज परम वयोवृद्ध सत्तरि वर्षीय पण्डित मोहन मिश्र दशवर्षीय कन्यासँ विवाहक प्रसङ्ग अछि । स्वयं पण्डित मोहन मिश्र सामान्य व्यक्ति नहि, हजारहु लोकक कनफुक्का  गुरु छथि । एहिमे वृद्धविवाहक  तीव्र भर्त्सना अछि, विधवा विवाह एवं तलाकक आवश्यकतापर बल देल गेल अछि –

“मिथिला, अंक 5, 1929, सम्पादकीय, वद्धृ विवाह,–‘सूचित करैत अत्यन्त ग्लानि होइछ जे राँटी–मंगरौनीक परम वयोवृद्ध ब्राह्मण जगत विख्यात मदन उपाध्यायक वंशज तथा हजारक हजार मैथिल जनताक कनफुक्का गुरु पण्डित श्रीमोहन झा जी लगभग 70म वर्षक अवस्थामे एहिबेरएक दशवर्षीया कन्याक पाणिग्रहण कैलन्हि अछि । यदि आन व्यक्ति कैने रहैत तँ कदाचित क्षम्य छल, परन्तु मदन उपाध्यायक वंशधर, अपार शिष्य मण्डलीक गुरुवर यदि एहन क्रिया करथि तँ नरको कियै नहि अपन नाक सिकोड़ै ? की एहना धर्माध्यक्षसँ केयो चेला अपन सद्गतिक आशा कै सकैछ ? कदापि नहि ? जो स्वयं अन्ध छथि, पाप–पंकमे लिप्त छथि–आनक उद्धार की करताह ? सबसँ नारकीय तँ थिक ओ कन्यादाता जे अपना लोभेँ कन्याक जीवनकेँ एहि   प्रकारेँ नष्ट कैलक अछि, यावत् एहि प्रकारक आततायी समाजमे वर्तमान रहत, तावत् एको बालिकाक जीवन एही निर्दयता रूपेँ नष्ट कैल जाइत रहत, यावत् एहि प्रकार एको विवाहकेँ विवाह कहल जाइत रहत – तावत् केवल विधवे विवाह (आपद्धर्म) नहि विवाहोच्छेदो अनिवार्य थिक ।”

एहिसँ स्पष्ट अछि जे बीसम शताब्दीक मध्यधरि मिथिलामे अनमेल विवाह होइत छल । सम्प्रति देश–देशान्तरमे होइत अनमेल विवाहक समाचार कहिओ काल छपैत रहैत अछि, किन्तु मिथिलामे एहन दुर्घटना किनसाइते आब सुनबामे अबैत अछि ।

पकड़ुआ विवाह

वरक अपहरण कए बलपूर्वक सिन्दूरदान करा देब पकडुआ विवाह थिक । ई विवाह सामान्यत: दू स्थितिमे होइछ – वर सहमत एवं अभिभावक असहमत तथा वर एवं अभिभावक दूनू असहमत । पहिल स्थितिमे वरकेँ नीक कनिञा देखाएकेँ एवं अन्य प्रकारक प्रलोभन दए फँसा लेल जाइछ । ठकल जएबाक भान वरकेँ सिन्दूरदानक बाद होइत छनि । एहि विवाहक मुख्यत: दू करण अछि – वरक बापक दहेज–लोभ तथा उच्चब्राह्मण कुलमे कन्या–विवाहक उत्कट लालसा । पहिने एहि लालसासँ बेस पकडुआ विवाह होइत छल । गत शताब्दीक उत्तरार्द्धमे एकहि राति हमर गामक तीन नवयुवकक विवाहक निमित्त अपहरण भए गेल छलनि । विवाहक बाद बिखिआकेँ आदर–सत्कार कए मनाओल जाइत अछि, हिन–छिन कएलापर धमकी आ’ यातना सामान्य बात होइत छैक । नवविवाहिताक  सङ्ग कोठलीमे बन्द कए देल जाइछ, जँ वर–कनिञामे गप–सप भए गेल तँ बुझल जाइछ जे समस्याक समाधान भए गेल । कतेको ठाम केसा–केसी सेहो होइत अछि, तथापि एहि विवाहक मुख्य कारण दहेज–लोभहि थिक ।

विजातीय विवाह

मिथिलामे विजातीय विवाहक सामाजिक अनुमति नहि छैक । एतेक धरि जे विभिन्न श्रेणीक मैथिल ब्राह्मणमे सेहो विवाहक अनुमति नहि अछि । ई प्रथा ततेक कठोर छल जे जँ उच्चश्रेणीक वरक विवाह निम्नश्रेणीक ब्राह्मण कन्यामे भए गेल तँ जाति वहिष्कृत कए देल जाइत छलनि । परम्परया लोककेँ ज्ञात छैक जे डा– अमरनाथ झा दोसर जातीय ब्राह्मण (जेना कान्यकुब्ज, शाकद्वीपीय, गौड़, कश्मिरी आदि) कन्यामे विवाहक इच्छा प्रकट कएल तँ पिता अनुमति नहि देलथिन । ओहिना जखन लक्ष्मीकान्त  झा, आइ–सी– एस–, इलाहाबाद विश्वविद्यालयक प्रो–आचार्य (बङ्गाली ब्राह्मण)क कन्या मेखला कुमारी देवीसँ, जे पूर्व परिचिता छलथिन एवं बिलेंतमे सेहो रहथि, विवाह कएल तँ हुनक समाजमे भूचाल उठि गेल । घोर जातीय विरोधक सामना करए पड़लनि । से तेहन विरोध जे हुनक सामाजिक एवं पारिवारिक परिचय सदाक लेल हेराए गेलनि । किन्तु ताधरि मैथिल समाजमे किछु युवावर्ग एहन अवश्य भए गेल छल जे एहन सामाजिक–जातीय  बन्धनक विरोधी छल । मैथिली पत्रिका ‘मिथिला मोद’ मिथिलामोद, (वर्ष 31, उदगार 3, माघ 1348 साल, 1941 ई.) एल.के.झाक अभूतपूर्व साहसक स्वागत कएने छल । एहिना कर्ण कायस्थहुमे विजातीय विवाह वर्जित छल आ’ जखन कायस्थक दू जातिमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित भेलैक तँ मैथिली पत्रिका ‘मिथिला’ (मिथिला, वर्ष 1, अंक 1, 1336 साल, 1929 ई.) ओहि विवाहक स्वागत कएने छल । किन्तु ओहि अवसरपर अपव्यय भेल, तकरहु विरोध कएल । एहिसँ ई प्रतीत होइत अछि जे गत शताब्दीक तेसर दशकमे जातीय कट्टरता कमल आ’ सामाजिक बन्धन शिथिल होअए लागल छलैक । किन्तु सम्प्रति विजातीयक कोन कथा, अन्तर्जातीय विवाह एवं आन्तरदेशीय विवाह सेहो होइत अछि । से केवल बेटे नहि, बेटीक डेग सेहो उठैत अछि । जेना–जेना शिक्षाक विकास होएत, माइ–बापपर आर्थिक निर्भरता कमतैक एवं अप्रवासनक गतिमे तीव्रता आओत, जातीय सीमा, सांस्कृतिक सीमा एवं राष्ट्रीयताक सीमा मेटाइत रहत । तखन ने पूबारिपार रहत आ’ पछबारिपार, ग्लोबल विलेज भए जाएत ।

विवाह आदिक अवसरपर अपव्यय

समाजकेँ सबसँ बेसी प्रदर्शन–प्रभाव (Demonstration effect) प्रभावित करैत अछि । ई देखौंस सदा साधन–सीमाकेँ अतिक्रमित करबा लेल प्रेरित करैत छैक । आ’ तकरा लोक अपन प्रतिष्ठा मानि मोनेमोन गुड़–चाउर खाइत रहैत अछि । जकरा अरजल भेटल रहैत छैक, अथवा अर्जनक अज्ञात–स्रोत छैक, तकरा लेल तँ सामान्य बात, मुदा समाजक ओ सदस्य जे साधनहीन अछि, तकर प्राण सङ्कटमे पडि़ जाइत छैक । समाजक साधन–सम्पन्न लोक ई नहि चिन्ता करैत छथि हुनक वैभव–प्रदर्शनक समाजक शेष सदस्यपर की प्रभाव पड़तैक । फल होइछ जे साधनहीन वा अल्पसाधनक लोक सामाजिक कुचेष्टासँ अथवा वरपक्षक माङ्गपर आकण्ठ कर्जमे डूबि जाइत अछि, औंठा बोरि वा जमीन–जत्था बेचि, हकन्न कनैत छथि ।

म–म–परमेश्वर झा ‘सीमन्तिनी आख्यायिका’मे जाहि कोटिक बरिआती एवं ठाठ–बाटक वर्णन कएने छथि, निश्चिते ओ कपोल–कल्पना  नहि रहल होएतनि । राजा–महाराजा तँ साधन–सम्पन्न छलाहे, प्रजाक साधन सेहो हुनके लोकनिक मनोरथपूर्तिक हेतु रहैत छल । सम्पूर्ण देश प्रथम स्वाधीनता संग्रामक जाहि योद्धा (बाबू कुंवर सिंह) पर गर्वोन्नत अछि, से अपन पौत्रक विवाहमे कतेक खर्च कएने छल होएताह, तकर अनुमान इतिहासकार डा.के.के. दत्ता द्वारा भेल उद्घाटनसँ अनुमान कए सकैत छी – Dr. K.K. Dutta, Biography of Kunwar Singh and Amar Singh, p.37, “Kunwar Singh performed the marriage ceremony of his grandson Birbhajan Singh with great pomp and eclat. He was married in the Gidhaur Raj family(Monghyr district). The Barat procession, which included the Rajas of Tikari and Deo, who came up to Patna, was like a self contained caravan having its own bazar, where everything could be purchased. Ten Hakims( Yunani physicians) and twenty five Vaidyas (Ayurvedic physicians) accompanied the Barat to look after cases of illness on the way. The journey to and from Gidhaur, took ten days each way and and Barat halted for five days. Raja Jaymangal Singh of Gidhaur, the host, entertained the Barat on lavish scale. On return from Gidhaur, Kunwar Singh gave one party at Arrah and another at Patna to the English officials.”रास बिहारी लालदासक उपन्यास ‘सुमति’ देखौंसक कुपरिणामपर केन्द्रित अछि ।

विवाह आदिक अवसरपर अपव्ययकेँ रोकबामे सामाजिक मर्यादाबोध सबसँ बेसी महत्त्वपूर्ण अछि । जाहि कोनो जाति वा वर्गमे किछुओ सामाजिक  मर्यादाबोध शेष छैक, प्रदर्शन–प्रभावपर नियन्त्रण अछि । जेना विवाहक अवसरपर अपव्ययकेँ रोकबा लेल मैथिल ब्राह्मण विशेषमे  सामान्यत: दिनमे कन्यादान  होइत अछि, बरिआतीकेँ एकहि बेर, सेहो अनोन भोज्यपदार्थ परसल जाइत छनि, बरिआती भोजनोपरान्त प्रस्थान कए जाइत छथि आ’ कन्याक द्विरागमन मण्डपहि परसँ भए जाइत अछि । ई सब बात सुनि लोककेँ अजगुत लगैत छैक । किन्तु ई अपव्यय पर आँकुश लगबैत अछि । जेना – दिवालग्नमे कन्यादानसँ प्रकाश व्यवस्था अल्पतम होइत अछि, अनोन व्यञ्जनक कारणेँ माछ वा मांसक फरमाइश वरागत नहि करैत छथि, बरिआती लेल रात्रि–विश्रामक व्यवस्था नहि करए पड़ैछ आ’ मण्डपपरसँ द्विरागमन भए गेलासँ दूनू पक्ष एवं अतिथिक समय तथा अर्थक बचत होइत छनि । प्राय: इएह अलिखित सामाजिक मर्यादाबोध थिकैक जे जखन समस्त मैथिल समाज लेन–देन आ’ दहेजक रोगसँ ग्रस्त अछि, पूबारिपारकेँ ई छूतहा रोग अद्यावधि नहि लागल छैक ।

आदर्श विवाह: नव परिभाषा

एक नब वैवाहिक समस्यासँ मिथिलावासी आक्रान्त होअए लगलाह अछि । ओ थिक शिक्षाक विकासक सङ्ग बालक एवं बालकक अभिभावकमे अर्थलोलुपता एवं भौतिक सुखोपभोगक अमित आकाङ्क्षा । व्यक्ति केन्द्रित आचरणसँ सामाजिकतामे ह्रास भेल अछि । पहिने मिथिलाक समाजमे दहेज नहि छल । जेना अन्य संस्कार पूर्ण नियम–निष्ठासँ अनुष्ठित होइत छलैक, ओहिना पाणिग्रहण संस्कार सेहो । कन्या पक्षक किछु लोक वर पक्षक ओतय, हुनक समाजक समक्ष कथा प्रस्तुत करैत छलाह । वरक अभिभावक अपन निकट सम्बन्धीसँ विचार–विमर्शक उपरान्त समाजक समक्ष ‘वाक्दान’ दैत छलाह । समाजे गवाह रहैत छलाह । मुदा आब वरक पिता कन्याक पितासँ एकान्तमे भेंट करैत छथि । मोल–जोल करैत छथि जाहिमे गर्भादानसँ आश्रम बसेबा धरिक खर्चक हिसाब रहैत अछि । वधूक आगमन पर जे स्वागत समारोह (रिसेप्शन) करैत छथि तकरहु खर्चक बिल कन्यागतहिकेँ चुकाबए पडै़त छनि । आ’ प्रचारित होइछ – ‘आदर्श विवाह’ । आदर्शक एहि परिभाषाकेँ गढ़बामे वरक माइक महत्त्वपूर्ण योगदान रहैत छनि । ओ बिसरि जाइत छथि जे हुनक अपन विवाहमे हुनक पिताजीकेँ कतेक कष्ट भेल छलनि । एहन आदर्श विवाहसँ भ्रष्टाचार एवं घूसखोरीकेँ प्रश्रय भेटैत छैक । कुमार्ग एवं अनैतिक ढङ्गसँ सम्पत्ति अर्जित करबाक लालसा बढ़ैत छैक । एहन आदर्श विवाहमे मैथिल ब्राह्मणक ओएह वर्ग बेसी सक्रिय अछि जिनकर पूर्वज ‘बिकौआ प्रथा’क सम्पोषक छलाह अथवा पाइक बलपर सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करए चाहैत छथि । मुदा, एकर दुष्प्रभाव मिथिलाक अन्यो वर्गक लोकमे पसरि रहल अछि । ओहो सब ब्राह्मण समाजमे व्याप्त सामाजिक एवं वैवाहिक कुरीतिकेँ सामाजिक प्रतिष्ठावर्द्धक मानि लेल अछि ।

लोक की कहत ?

मैथिली पत्रिका ‘मिथिला’  अपन सम्पादकीयमे लिखैत अछि जे मैथिल ब्राह्मणमे वृद्धविवाह एवं बहुविवाहक प्रथा जतबा कम भेल अछि ततबा बालविवाह एवं तिलक प्रथाक वृद्धि भेल अछि । किछु दिनसँ जात्यांशक अनादर एवं धनांश तथा अङरेजी विद्याक आदर बढि़ गेल अछि । जाहि वरमे एहि दूनू गुणक सम्भावना वा अस्तित्व छन्हि तनिक तँ चर्चे नहि ’-

“मैथिल समाजमे बालविवाह ओ तिलक, मिथिला, वर्ष 1,अंक 1, 1336 साल/ 1929 ई.

मैथिल ब्राह्मणमे वृद्धविवाह एवं बहुविवाहक प्रथा जतबा कम भेल अछि ततबा बालविवाह एवं तिलकक प्रथाक वृद्धि भेल अछि । हरिसिंहदेवी व्यवस्थाक विरुद्ध प्राय: कोनो रूपे टाका लेबाक प्रथा नहि छल । किछु दिनसँ जात्यांशक अनादर एवं धनांश तथा अङरेजी विद्याक आदर बढि़ गेल अछि । जाहि वरमे एहि दूनू गुणक सम्भावना वा अस्तित्व छन्हि तनिक तँ  चर्चे नहि । धनीक घरक मूर्खो नेना आब 12–14 वर्षसँ अधिक वयसक भेटब असम्भव भै रहल अछि । एही प्रकारक नेनाक प्रतिएं हजार–हजार रुपैआ गनाओल जाइछ । गत शुद्धमे एकर बजार बहुत गर्म छल । विस्वस्त सूत्रसँ विदित अछि अनेको व्यक्ति हजार–हजार तिलक लेलन्हि । जकर सूचना हम आगामी कोनो अंकमे प्रकाशित करब । एहि दुर्व्यवहारसँ मैथिल ब्राह्मण समाजमे कतेक कन्या बंगीय स्वर्णनता जकाँ आत्महत्या करति तकर निश्चय नहि । की मैथिल समाज एहि संक्रामक रोगके आरम्भहिमे रोकबाक यत्न नहि करत ?”

1909 ई. मे मिथिलामे महादेव झा एवं श्रीकान्तझाक चलती (पाँजिक महत्त्व) छल । मुदा 1929 ई– मे धन एवं अङरेजी विद्याक आदर बढि़ गेल । पहिने वरक मूल्यक निर्धारण जातीय श्रेष्ठताक आधारपर होइत छल, आब सेवा एवं आय–स्रोतक आधारपर होइत अछि । जेना– आइ.ए.एस, आइ.पी.एस., डाक्टर, इंजीनियर, बैक अथवा अन्य सेवाक अधिकारी, लिपिक संवर्ग आदि । हालहिक घटना थिक, सुखी–सम्पन्न परिवारक एक बैंक अ धिकारी, दोसर बैंक अधिकारीक स्नातकोत्तर कक्षामे सम्पूर्ण संकायमे प्रथम एवं स्वर्णपदक प्राप्त कन्यामे सरकारी सेवामे कार्यरत अपन पुत्रक विवाह एहि शर्तपर स्वीकार कएल जे जखन हुनक बालक विवाहक हेतु छुट्टीपर आबथि, स्टेशनपर नबका गाड़ी तैआर रहनि । ई शर्त नगद आ’ गहना–गुडि़आक अतिरिक्त छल । वरक बापक तर्क छलनि जे लोक की कहत ? एहि प्रकारेँ ओ अपन बेटाक मूल्य समाजकेँ देखाबए चाहैत छलाह । समाजक एहन–एहन लोकक लेल नैतिकता आ’ सामाजिक मर्यादाक कोनो महत्त्व नहि छैक । दहेज–निरोधक कानून कोनो अर्थ नहि रखैत अछि ।

एकटा आर उदाहरण प्रस्तुत अछि । कन्याक पिता एवं पितामह मैथिलीक ख्यातलब्ध  साहित्यकार छथि । सङ्गहि, सामाजिक रूपसँ तथाकथित उच्च बाह्मण कुलक सेहो छथि । हुनक डाक्टर कन्या पिताक कुलसँ तथाकथित निम्न ब्राह्मण कुलसम्भूत सहपाठीकेँ वरण कए लेल । कन्याक पिता डाक्टर जमाय पाबि प्रसन्न छलाह तँ वरक पिता डाक्टर पुतहु पाबि प्रसन्न । एहि प्रेम–विवाहमे कोनो लेन–देन वा शर्त नहि छल । विवाहक समस्त तैआरी भए गेल । अन्तिम समयमे वरक माइ कहलथिन, ‘एहनो कोनो विवाह भेलैक अछि जाहिमे कोनो चीज–वस्तु नहि देल जाइक! कमसँ कम एकटा गाड़ी तँ दिअए चाहिअनि ।’ कन्यागत धरि वरक माइक माङ पहुँचल । कन्यागतक लेल कोनो विकल्प नहि छल ।

ई दूनू उदाहरण सिद्ध करैछ जे मिथिलाक सुशिक्षित कन्यामे वैवाहिक कुरीतिक विरुद्ध ठाढ़ होएबाक साहस नहि भेल छनि । दूनू घटनामे कन्या उच्चशिक्षा पाबि सुशिक्षिताक श्रेणीमे अछि । किन्तु जीवनक आरम्भहिसँ   तेना चपाएल रहल छथि जे अन्यायक विरुद्ध ठाढ़ होएबाक लेल अपेक्षित आत्मबलक अभावकेँ हुनक किताबी ज्ञान पाटि नहि सकल अछि । कहि सकैत छी सांस्कृतिक रूपसँ अविकसित अछि । शास्त्रीय शब्दावलीमे इएह थिक Cultural lag.

एक आर समस्या गत किछु वर्षमे जनमल अछि । ओ थिक प्रेम–विवाह । प्रेम–विवाहक स्थितिमे वधू तँ स्वीकार कए लेल जाइछ, मुदा माङ्गक तह क्रमश: जखन खुजए लगैत छैक तखन दाम्पत्य जीवनमे तनाओ बढ़ैत अछि । फेर गृहहिंसा, उत्पीड़न, तलाक, हत्या आ’ आत्महत्याक क्रम शुरू भए जाइछ ।

समुद्रयात्रा

बौद्धकालीन भारतमे वणिक समुदायक प्रभुत्व छल । ओ व्यवसायक हेतु समुद्र यात्रा करैत छलाह । देश घुमलापर पाइ–कौड़ी तँ रहिते छलनि सङ्गमे समुद्रपार देशक आचार–व्यवहार सेहो आबि जाइत छल । एहि आयातित आचार–व्यवहारक भारतीय संस्कृति पर जखन प्रतिकूल प्रभाव पड़ए लागल तँ ब्राह्मण एवं पुनरुत्थानवादी हिन्दू समाज ओकरा रोकबाक लेल एहन सामाजिक व्यवस्था बनौल जाहिसँ समुद्र यात्रा धर्मविरुद्ध मानि लेल गेल – Dr. Dinesh Chandra Sen, The Folk Literature of Bengal, 1920, P.No.62 – “And, if they returned to India, they came with strange outlandish manners imitating the ways of foreigners, and fell upon thier quiet homes like thunder-bolts destroying the Hindu ideas of domestic life. The Brahminical leaders, in the absence of any political power to control the  situation, prohibited sea-voyages and enacted social laws for outcasting those who would be guilty of infringing them.”

समुद्रसँ कोसो दूर मिथिलामे समुद्र यात्रा हाल–हाल धरि अधार्मिक काज छल ।  प्रथम स्वाधीनता आन्दोलनक असफलताक उपरान्त जखन भारतक शासन कम्पनी सरकारक हाथसँ बृटिश साम्राज्ञीक हाथसे आएल तँ एहन–एहन बाट ताकल जाए लागल जाहिसँ भारतक तरुणवर्ग अङरेजी रङ्गमे पूर्णत: रङ्गि जाथि आ’ हुनक शासन दिन प्रति दिन आर सुदृढ़ होइत जाए । मुदा, उपनिवेशवादी  सरकारक एहि तरघट्टीकेँ स्वाधीनताकामी भारतीय चेतना बूझि गेलनि । ओ अपन उपनिवेशवादी  शासकक भाषा, हुनक शिक्षा–प्रणाली,  विज्ञानक क्षेत्रमे होइत नित्य नवीन आविष्कार, हुनकर अन्तर्विरोध एवं द्वैध चरित्रकेँ सेहो यथाशीघ्र बूझि लेबय चाहैत छलाह । एहि हेतु बिलेंत जाए शिक्षा  प्राप्त करब आवश्यक छलैक आ’ से बिना समुद्र यात्राक सम्भव नहि छल । मिथिलामे एहि तथ्यकेँ बुझबामे समय लगलैक । मिथिला मिहिर,‘अङरेजी शिक्षा’ शीर्षक लेख (मिथिला मिहिर, अगस्त,1914 ई.) मे कहैत अछि जे प्रजाक हेतु राजाक भाषा जानब आवश्यक होइ छैक,किएक तँ राजाक आदेश राजाहिक भाषामे रहैत अछि । जे मनुष्य राजभाषा नहि जनै छथि ओ सांसारिक बहुतो विषयसँ अनभिज्ञ रहै छथि । बहुतो बेरि एहि अज्ञानताक कारण बड़े कष्टमे पड़ै छथि । बेबकूफ बनै छथि, और बहुत हानि उठबै छथि ।

1882 ई. मे पूना सार्वजनिक सभाक एक निर्णय भेलैक जे प्रत्येक वर्ष मे धावी छात्र केँ उच्चशिक्षाक हेतु बिलेंत पठाओल जाए । ओहि निर्णयक जनतब महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह (1858–1898 ई )केँ समाचारपत्रक माध्यमसँ भेटलनि । स्वयं कट्टरवादी परिवार आ’ सामाजिक परिवेशक होइतो ओ पत्र द्वारा निर्णयक स्वागत कएल । किछु सुझाओ सेहो देलथिन –

“Dr. Jata Shankar Jha, Biography Of An Indian Patriot Maharaja Lakshmishwar Singh of Darbhanga, Page No.243, Patna, 1972.

To,

The Secretary of Poona Sarbjanik Sabha,

Dt.  7.3.1882.

Dear Sir,

I casually came across a paragraph in the papers saying that you propose  sending a few youngmen out to England every year to study for the bar and the other lucrative profession that are now almost entirely monopolized by foreigners……………………………………………….

In conclusion I have only to say that I hope to be excused for this long letter. I have said all that I really given any offence. It is through the influence of such association as the Sabha of Poona, that we hope for the regeneration of India and every Indian and its  inhabitants and I will always be only too glad to do  all that I can to carry out any your suggestions. The very name of Poona and Satara calls to our mind the almost superhuman efforts of Shivajee and the grand old Peshawas to free India from the thraldom and tyranny of Mohammadan rules and your Shabha still makes us think that in Poona at least the old spark of patriotism is not extinguished. Hoping to be favoured with an early reply. I remain,

Yours faithfully.

Sd. L. Singh

ओ अपन उपचारकर्ता चिकित्सकक कहलापर बिलेंत जएबाक पूरा तैआरी कए लेने छलाह किन्तु समाज–भयसँ समुद्र–यात्रा स्थगित करए पड़लनि । यात्राक स्थगन हुनका लेल घातक भेल । मिथिलाक समाजक लेल सेहो ओ नीक नहि भेलैक, ओ पछुआ गेल । समुद्र यात्राक नामपर हुनक भातिज महाराजा धिराज कामेश्वर सिंहकेँ स्वजातीय बारि देलथिन । दोसर दिस बड़ौदाक महारानी 1912 ई सँ पूर्बहि विश्वभ्रमण कए भारतीय महिला समाजक उत्थानक लेल अपन अनुभवकेँ लिपिबद्ध कए लेने छलीह-“ Her Highness the Maharani of Baroda and S.M.Mitra,The Position of Women in Indian Life, Preface,1912. “ During the course of several visits to the West, both to Europe and to America, I was naturally struck by the difference between the position of woman in English and in Indian public life, as represented by her share in the organizations for human welfare in the two countries. The cooperation which exists between Westen men and women in public affairs is practically unknown in India. Public matters in India are almost entirely in the hands of men, and the reason is not far to seek, because the useful organizations for human welfare, in which women cooperate with men in the West hardly exist in India, and where they do technically exist, their influence is scarcely felt.”

यदि समुद्रयात्रा धर्मर्मविरुद्ध घोषित नहि भेल रहैत तँ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक अमलदरीएसँ मिथिलावासी समुद्र यात्रा कए नव–नव ज्ञान अर्जित करैत रहितथि । कालान्तरमे हुनका सङ्गे हुनक पत्नी एवं बेटी सेहो देश–देशान्तरमे रहि उच्चशिक्षा प्राप्त करितथि आ’ मिथिलाक महिला समाजक सशक्तिकरणक गति, ओहि स्थिति सबहक कारणेँ जकर उल्लेख  Amie GAYE and Shreyashi Jha यूनेस्कोक अपन रिपोर्टमे कएने छथि, कमसँ कम सए वर्ष पाछू नहि रहि गेल रहैत । (Amie GAYE and Shreyasi Jha – Measuring Women’s Empowerment through Migration, UNESCO, Diversities, Vol.13,No.1, page No. 49, 2011 _”Since 1950, the female share of international migrants has been moved as ‘accompanying family dependents’, however, currently more women are migrating independently in search of jobs. This change is a result of a combination of factors- changes in the demographic structure, increasing demand for cheaper caregivers in rich countries, more visible inequalities in wealth and aggressive policies of private recruitment agencies.”)

सम्प्रति बहुविवाह नहि होइछ, बालविवाह नहि होइछ, अनमेल विवाह नहि होइछ, वृद्ध विवाह नहि होइछ, वि धवा विवाहकेँ आब घृणाक दृष्टिसँ नहि देखल जाइछ, तलाक आ’ फेर विवाह होअए लागल अछि, जातीय बन्धन शिथिल भए गेलैक अछि, कन्या अपन रुचि–अरुचि अपन अभिभावककेँ कहए लागल छथि, माइ–बाप द्वारा ठीक कएल विवाह–प्रस्तावकेँ तोडि़ प्रेमीक सङ्ग भागए लागल अछि, सहजीवन (Co-habitation/Live-in-relationship) सेहो जिबैत छथि । ई सब शिक्षा आ’ आत्मनिभर्रताक परिणाम थिक । जेना–जेना शिक्षाक विकास होएत, देश–विदेशमे शिक्षा एवं जीविकापन्न होएबाक अवसर भेटतैक, एवं नव–नव सामाजिक यथार्थसँ संघर्ष करए पड़तैक, ई स्थिति बढ़त । कतहुसँ एकरा सभकेँ सामाजिक कुरीति नहि कहि सकैत छी । किन्तु स्त्रीगण समाजमे शिक्षाक  विकास एवं आर्थिक आत्मनिर्भतासँ स्वतन्त्र व्यक्तित्व स्थापनाक जे चेतना क्रमश: वेगवती भेल जाइछ, से पुरुष वर्चस्वक पारम्परिक समाजकेँ पचि नहि रहल छैक । ओ समाज नारी सशक्तिकरणकेँ पुरुष वर्चस्व पर आघात मानय लागल अछि । औना गेल अछि । ओही खौंझ आ’ औनैनीक अभिव्यक्ति बलात्कार सदृश घृणित आचरणक रूपमे हमरा लोकनि देखैत छी । न्याभ्रूण हत्या सेहो ओकरहि परिणाम थिकैक ।

जेना ऐतिहासिक अभिलेखक आधारपर स्पष्ट कएने छी, मिथिलामे अङरेजी शिक्षाक  प्रचार–प्रसार एवं विकास पर्याप्त विलम्बसँ भेलैक । स्वाधीनताक बाद जखन ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था बिगड़ए लागल तँ पहिने नवयुवक वर्ग आ’ फेर हुनक परिवारक सदस्य नगरवासी होअए लगलथिन । मिथिलामे जीविकाक साधन नहि छल, औद्योगिक प्रतिष्ठान नहि छल, औखन नहि अछि, पड़ैनी लागल छैक, अतएव, अपन माटिपर रहि स्त्रीगण द्वारा समाजक समस्याक समाधानक हेतु जे सामूहिक प्रयास सम्भव छैक आ’ ओहि लेल जेहन सांगठनिक क्षमता अपेक्षित अछि, से मिथिलाक नारी–समाजमे विकसित नहि भए सकल अछि ।

देशक विभिन्न क्षेत्रमे सांस्कृति मिथिला अछि, ओ लोकनि सङ्गठन बनौने छथि, कोनो–कोनो शहरमे मैथिल महिलाक पृथक सङ्गठन सेहो अछि, मुदा हुनका लोकनिक  कार्य–कलाप सांस्कृतिक गतिविधिए धरि सीमित अछि । सामाजिक जीवनमे जे नव–नव विकृति जनमि रहल अछि अथवा जकर रूप विकराल भए गेल छैक, तकरा पराभूत करबा लेल अपेक्षित सामूहिक साङ्गठनिक प्रयासक ओहि संस्था सभमे सम्प्रति घोर अभाव अछि ।

तैओ, सामाजिक स्तरपर एहन संकेत आबए लागल अछि जे स्त्री–शिक्षाक विकास, एवं आत्मनिर्भताक बढ़ैत अवसरसँ कन्यामे वरण एवं अस्वीकार करबाक क्षमता विकसित भए रहल अछि । मिथिलाक स्त्रीगण समाजमे एहि क्षमताक विकास जतेक क्षिप्रतासँ होएत, ‘आदर्श विवाह’क गढ़ल वर्तमान परिभाषा बदलत । अथवा ‘लोक की कहत’सदृश असामाजिक एवं निराधर गौरवबोधपर ओतेक शीघ्रतासँ विराम लागत ।

पचास वर्षसँ बेसी भेल होएतैक । ‘मिथिलाक विदुषी महिला’क खण्डित प्रति हाथमे आएल । पछाति श्यामानन्द झाक सङ्कलनमे एकर पूर्ण प्रति सेहो भेटल । पढि़ उत्सुकता जागल । पोथीमे वर्णित एकटा विदुषी हरिलता (मोदवती)क सन्निकट छलहुँ । खोधि–खोधि पुछैत रहलिअनि । ओ जे किछु कहलनि, एक भुक्तभोगीक व्यथा छल । ओहिसँ बीसम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मिथिलाक सामाजिक स्थितिकेँ जनबाक अवसर भेटल । एहि अवसरपर ओ स्मरण भए रहल छथि ।

एहि पोथीक प्रसङ्ग किछु अद्भुत संयोग सब अछि । लालगंजमे गामक उत्तर मैथिलीक सुकवि एवं आन्दोलनी गणेश्वर झा ‘गणेश’ छलाह तँ दक्षिणमे श्यामानन्द झा । गणेश्वर झा ‘गणेश’क पत्नी अरुन्धती देवी पोथी लिखि मिथिलाक विदुषीक अवदानकेँ सुरक्षित कएल तँ श्यामानन्द झाक पत्नी पतिक साहित्य एवं सङ्कलनक संरक्षण आजीवन कएल । एकटा आर अद्भुत संयोग अछि, कवीश्वरी हरिलता ‘मिथिलातीर्थ प्रकाश’ एवं मैथिलीक पहिल कथा संग्रह ‘चन्द्रप्रभा’क यशस्वी लेखक पण्डित श्रीकृष्ण ठाकुर(सर्वसीमा)क दौहित्री छलीह तँ अरुन्धती देवीक माइक मातृमातृक ओहिठाम ।

‘विदुषी महिला’क लेखनक लक्ष्य महत्त सांस्कृतिक  अछि । ओ उद्देश्य थिक मिथिलाक  सुदीर्घ विदुषी परम्पराकेँ मातृभाषाक माध्यमेँ मातृजनक सम्मुख आनब जाहिसँ लोक उत्प्रेरित होअए । मैथिलीमे एहन लेखनक परम्परा नहि छल, अरुन्धती देवी मैथिलीमे श्रीगणेश कएल । एहि लेल ओ स्तुत्य छथि । हुनक प्रयास स्तुत्य अछि । एहि पोथीकेँ मिथिलाक विदुषी द्वारा मैथिलीमे लिखित पहिल पोथी होएबाक गौरव प्राप्त छैक । एहिमे छओ एहन विदुषी छथि जे लेखिकाक समकालीन छलथिन । एहिसँ स्पष्ट अछि जे हुनक दृष्टि केवल मिथिलाक प्राचीन विदुषीलोकनिक  उपलब्ध परिचय एवं अवदानकेँ लिखब मात्र नहि छल, अपितु समकालीन विदुषी लोकनिक कृतित्वकेँ लिपिबद्ध कए भविष्यक अनुसन्धानकर्ताक लेल सेहो बाट प्रशस्त करब छल । संस्कृतमे वा आन भाषामे एहन परम्परा रहल होएत मुदा मैथिलीमे एहन लेखनक सूत्रपात अरुन्धती देवीसँ होइत अछि ।

एहि पोथीक पुनर्मुद्रण हो, से इच्छा कतेको वर्षसँ छल । एहि वर्षक पूर्वार्द्धमे जखन गाम गेलहुँ, एकर फोटो प्रति सङ्गमे छल । परम सामाजिक लोक श्री मिथिलेश देखलनि । ओ अपन उत्सुकता एवं प्रसन्नताक प्रदर्शन लेखिकाक घरक लोकक समक्ष कए देल ।  पोथी देखि गौरवक बोध भेलनि । लेखिका एही हेतु पोथी लिखने छलीह, जे पोथी पढि़ समाज गौरवक बोध करए । ओहिसँ ऊर्जा पाबि भाषा–साहित्य एवं संस्कृतिक संरक्षणक प्रति साकांक्ष होअए । हुनक परिश्रमक ई सफलता थिक ।

एहि पुनीत काजमे प्रो– भैरवेश्वर झा सङ्ग भेलाह अछि । ओएह लेखिकाक दुर्लभ फोटो  हुनक कन्या श्रीमती ललिता देवी (श्रीमती हीरा देवी, रामपुर, सम्प्रति बनारस)सँ उपरौलनि आ’ तर्पणक भार उठाए लेल । हम तँ अपनाकेँ धन्य मानैत छी मैथिलीक एक अप्राप्य कृति केँ समाजक समक्ष अनबाक एकटा आर अवसर भेटल । पण्डित श्रीभवनाथ झा ‘भवन’ विदुषी विश्वास देवीक प्रसङ्ग महत्त्वपूर्ण सूचना देलनि अछि । एहि सारस्वत काजमे सहयोगक लेल सभ केओ धन्यवादक पात्र छथि ।

ठीक सए वर्ष पहिने (1912 ई–) बड़ौदाक महारानी चिम्ना वाइ द्वितीय भविष्यवाणी कएने छलीह जे जखन बीसम शताब्दीक समाप्तिपर ओकर इतिहास लिखल जाएत तँ ओ महिलाक विकासक इतिहास होएत – Her Highness the Maharani of Baroda and S.M.Mitra, The Position of Women in Indian Life, Page No.1, 1912.-“When the final chronicle of the twentieth century comes to be written, probably the most remarkable feature in its annals will be the history of the development of woman.” बीसम शताब्दी तँ नहि भए सकल, किन्तु मिथिलाक स्त्री–समाजमे जाहि प्रकारसँ चेतना आबि रहल अछि, ई आशा सहजहि कए सकैत छी जे एकैसम शताब्दीक मिथिलाक इतिहास, मिथिलाक स्त्री–समाजक विकासक इतिहास होएत । ओहि दिशामे ‘मिथिलाक विदुषी महिला’क पुनर्प्रकाशन एक शुभसङ्केत थिक ।

हम ने इतिहासज्ञ छी आ ने समाजशास्त्री तेँ  जँ विज्ञजनकेँ एहिमे कोनो त्रुटि भेटनि तँ एक अल्पज्ञक दुस्साहस मानि कृपया क्षमा कए देथि ।

नीक वा अधलाह - ज़रूर कहू जे मोन होय

comments