पटना विश्वविद्यालय मे शुरु होएत तिरहुता आ कैथी लिपिक पढाई

पटना  । कैथी आऔर मैथिली लिपि कहिओ विलुप्त नहि भ’ सकैत अछि। अहिकें संवर्धन हेतु नव गाछ रोपल जा रहल अछि आ संगहि सँग गति सँ तैयार सेहो भ’ रहल अछि। लिपि सँ अवगत होयबाक लेल नवका पीढ़ी आब स्वयं आगु आबि रहल अछि, जे आह्लादित करय बला बात अछि।
पटना विवि केर कुलपति प्रो. रास बिहारी सिह ई उद्गार कएलनि अछि। पटना सग्रहालय सभागारमे ‘बिहारक विलुप्त होयत लिपि  तिरहुता एवम कैथी’ विषय पर सगोष्ठीमे बिहार पुराविद् परिषद, मैथिली साहित्य सस्थान एवम फेसस केर तत्वावधानमे विद्वतजन सभ अपन अपन बात रखलाह।
पटना विवि के कुलपति प्रो. रास बिहारी बजलाह कि भाषा आऔर लिपि भारतक सांस्कृतिक विविधताक सँग एकताक प्रतीक सेहो अछि। लिपी केर विलुप्त भेलासँ सांस्कृतिक आघात पर अंकुश लगेबाक लेल पटना विवि द्वारा लिपि केर शिक्षण कराओत। लिपि केर आगु बढायब एवम पढउनीक लेल पटना विवि तैयार अछि। पटना विवि कुलपति रास बिहारी सिह आगु बजैत अछि जे बिहारक विलुप्त होयत लिपि कैथी आऔर मिथिलाक्षर केर पढ़ाई पटना विवि मे होय जाहि मादे पाठ्यक्रम आऔर पोथी तैयार करबाक जिम्मेवारी मैथिली साहित्य सस्थानकें देल जाएत। पटना विविमे अरबी, बाग्ला, सस्कृत, मैथिली आदि भाषा सभक पढ़ाईमे छात्र सभक अकाल पड़ल अछि। मैथिलीमे पाँच टा शिक्षक आऔर छात्र सभक सँख्या सेहो पाँच अछि। बीएन कॉलेजमे मैथिली केर पढ़ाई बन्द भ’ गेल। कुलपति मैथिली आऔर अन्य सस्थान सभक मदति जँ भेटल त’ विवि मे लिपिक पढ़ाई होयत। जाहिसँ छात्र सभकेँ बेसी लाभ भेटतनि।
कनाडासँ आएल प्रोफेसर आनद मोहन शरण पाटलिपुत्र केर इतिहासकें प्राचीन ईरान सँ जोड़ैत बजलाह कि देवी लिपि केर परिवर्तित स्वरूप प्रचलित भेल अछि। पडित भवनाथ झा विभिन्न शिलालेख केर माध्यमसँ मिथिलाक्षर आऔर बांग्ला लिपिक संदेह दूर करैत कहैत अछि कि बंगाल सँ पहिने मिथिलामे लिपि प्रचलित छल।भारतीय पुरातत्व केर डॉ. जलज तिवारी लिपिकें उद्भव आऔर विकास पर अपन बात रखलाह। कार्यक्रमक संचालन फेसस केर सचिव सुनीता भारती कएलीह। इंटक केर प्रेम शरण बजलाह जेना मातृभाषाक प्रति लोकक सिनेह होयत अछि तहिना मातृलिपि सँग विशेष अनुराग जगेबाक आवश्यकता अछि। कार्यक्रममे अध्यक्षीय भाषण डॉ. चितरंजन प्रसाद सिन्हा एवम धन्यवाद ज्ञापन प्रो. डॉ. किरण कुमारी कएलिह।
अहि अवसर पर आनदव‌र्द्धन सिन्हा, लेखनाथ मिश्र, विवेकानद झा, रघुवीर मोची, अशोक सिन्हा, शकर सुमन आदि सभ अपन विचार रखलनि। सगोष्ठीकें समय लिपिक वर्कशापमे शामिल प्रतिभागी सभकेँ प्रमाण पत्र बाँटि हुनक हौसला बढ़ाओल गेल। अहि सुअवसर पर  दरभंगा विवि केर पूर्व कुलपति डॉ. रत्नेश्वर मिश्र अपन उद्गार मे कहैत अछि जे मिथिलाक्षरमे सस्कृत पाडुलिपि सभक सख्या करीब 50 हजार अछि। जाहिमे सँ बेसी एखन धरि पढ़ल नहि गेल अछि। कैथी केर उपयोगिता पर ओ कहैत अछि कि 1953 मे बिहार बगाल-उड़ीसा सीमानक झगड़ा  सोझरेबामे कैथी लिपीक मदतिसँ बिहारक बड़का भूभाग बगाल उड़ीसा जएबा सँ बचा लेल गेल। अतिथि सभकें स्वागत करैत डॉ. शिव कुमार मिश्र बजलाह कि राज्य सरकार एवम सांस्कृतिक संस्था सभ लिपिकें बचएबाक हेतु जँ अपन अपन स्तरसँ प्रयास नहि करताह त’ अहि लिपी केर बचाएब असंभव होयत।

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