मैथिलीक विकास मे मुसलमानक योगदान ककरो स कम नहि : मंजर

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मणिभूषण राजू
दरभंगा । उर्दू आ मैथिलीक विद्वान डॉ मंजर सुलेमान कहला अछि जे मैथिली भाषाक विकास मे मुसलमानक योगदान ककरो स कम नहि अछि। मिथिला नहि केवल सांस्कृतिक सौहार्द क जमीन अछि बल्कि मिथिला भाषाई समरसताक धरती सेहो अछि। दूनू भाषा एक दोसरक शब्द अपनेलक अछि आ उर्दू भाषा साहित्य करीब 500 मैथिल शब्दक उपयोग भ रहल अछि। ओहिना मैथिली मे उर्दूक शब्द घुलमिल गेल अछि। डॉ सुलेमान रविदिन ईसमाद फाउंडेशन क आचार्य रामानाथ झा हेरिटेज_सिरीज़ क क्रम में मैथिली भाषा के विकास में मुस्लिम समुदाय का योगदान पर बाबू जानकीनंदन सिंह मेमोरियल लेक्चर द रहल छलाह।
मिथिला आ मैथिली के विकास में मुस्लिम समाज के योगदान संग हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करैत तेरहवीं शताब्दी सं एखनतक के कतेको घटना के चर्च करैत डा. सुलेमान मन मोहि लेलथि।इस्लाम में सूफी परंपराक प्रारंभ में दरभंगाक योगदान सं लय गंगा-यमुनी तहजीब के नायाब उदाहरण प्रस्तुत करैत डा. सुलेमान मिथिला आ मैथिली दूनू परिप्रेक्ष्य में मुसलमानक योगदान पर विस्तृत जानकारी देलनि।मुल्ला तकिया सं प्रारंभ कय इमाम ताज फतीहा आ हुनक पुत्र इमाम इस्माइल सं होईत दरभंगी खां के बाद सं सदरे आलम गौहर तक अनेकों मैथिलपुत्रक जानकारी देलनि जिनक मिथिला आ मैथिली संग दरभंगा के विकास में अविस्मरणीय जानकारी देलनि। दरभंगा राज के रामबाग किला बनेबाक हेतु समस्त मुस्लिम समुदाय द्वारा कयल सहयोग के संक्षिप्त चर्चा सेहो भेल।
ललित नारायण मिश्रा विश्वविद्यालय के कुलपति डा एस के सिंह ईसमाद के मिथिलाक विरासत के सम्हारय के एहि प्रयास के साधुवाद देलनि आ मिथिलाक विरासत के बचेबाक एहि मुहिम के जन-जन तक पहुंचाबय के लेल सतत सहयोग के आश्वासन देलनि।
अध्यक्षीय भाषण में श्री गजानन_मिश्र कहलथि जे मिथिला के विरासत मिथिले संग नुकायल रहल अछि, एहि विरासत के सहेजकय आम लोक तक पहुंचाबय के लेल ईसमाद के बारंबार धन्यवाद। ओ कहय छथि जे हम-सब मिथिला के इतिहास विद्यापति संग प्रारंभ कय चन्दा झा तक पहुंचैत समाप्त कय दैत छी जबकि वास्तविकता अछि जे एहि सं बहुत पुरान आ बेसी पैघ विरासत अछि मिथिला के। चर्चाक क्रम में ओ कहलथि जे मिथिला में 44 तरह के साग होईत अछि आ मात्र 100 साल पहिले हमरा सब ओतय 132 प्रकार के माछ होईत छल। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनैतिक हर विधा में सबसं उच्च श्रेणी में मिथिला छल। हम-सब अपन बजार के खत्म कय लेलौं आ आब हम-सब मात्र उपभोक्ता बनि रहि गेलौं आ अपन सबके मिथिला आब शिथिला भय गेल अछि। पुन: मिथिला तक पहुंचय लेल हमरा सबके अपन बजार बनाबय पड़त आ दुनिया के सामने अपन पहचान साबित करय पड़त।
ईसमाद फाउंडेशन द्वारा प्रारंभ कयल ई प्रयास निश्चयरूपेण एकटा मील के पत्थर साबित होयत।
इहि सं पूर्व कुलपति कंदर्पी घाटक युद्ध क निशानी मिथिला विजय स्तंभ क प्रतिलिपि क अनावरण कयलथि। 
कार्यक्रम में कुलसचिव कर्नल निशीथ कुमार राय, अध्यक्ष, छात्र कल्याण प्रो रतन कुमार चौधरी, राजनीति विज्ञान क प्रो जितेंद्र नारायण, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो चंद्रभानु प्रसाद सिंह, प्रो विश्वनाथ झा, डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू, प्रो विनय कुमार चौधरी, डॉ शंकरदेव झा, महाराजाधिराज कामेश्‍वर सिंह कल्‍याणी फाउंडेशन क विशेष पदाधिकारी श्री श्रुतिकर झा आ बिहार विधान परिषद के पदाधिकारी श्री रमनदत्‍त झा, अशीष चौधरी, प्रवीणझा संग अनेकों लोक उपस्थित छलथि।
धन्यवाद ज्ञापन करैत इसामद फाउंडेशन के न्यासी संतोष कुमार कहलनि कि मिथिला क विद्वत समाजे मिथिला के सही दिशा द सकैत छथि आ अपन इतिहासक ज्ञाने टा मिथिला के पहचान के लौटा सकैत अछि। मंच क संचालन सुमन झा कयलथि।

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