सुलभ दूर करै कलावतीक चिंता

मुंबई । विदर्भ क किसान नित्य आत्महत्या कए रहल अछि। एहि ठाम गरीबी आ कर्जक बोझ स कोनो एकटा परिवार दबल नहि अछि। इ तथ्य तहियो साफ छल जहिया राहुल गांधी संसद मे अपन भाषणक दौरान कलावती क नाम लेने छलाह। आइयो ओहि गाम मे कईटा कलावती छथि। मुदा हम सब एकटा कलावतीक दुख कए जानि ओकर निराकरण करबा लेल प्रयत्नशाील भेल छी, जखन कि ‘हमरÓ कलावती अपना सन कई कलावतीक दुख खत्म करबा लेल छटपटा रहल छथि। ओ चुनाव मैदान मे कूदबाक घोषणा केने छलीह, मुदा नाम वापस ल लेलथि। ओ चुनाव मैदान स बाहर भ गेलीह, मुदा इ सवाल जरूर उठा देलथि जे कि मात्र कलावतीक मदद स समस्याक समाधान भ सकैत अछि। कलावतीक चिंता उचित अछि। इ सवाल पहिनो उठल छल जे राहुल अगर कलावती क नामक उल्लेख केलथि त ओकर अर्थ ओ गामक उल्लेख सेहो भ सकैत अछि, एहन मे कलावतीक मदद करबा स ओहि गामक मदद करब बेसी उपयोगी होयत। एक बेर फेर इ गप सामने आयल अछि जे व्यक्तिक मदद करबा स नीक रहत जे कम स कम ओहि गाम क मदद कैल जाए, जाहि मे कलावती सन आओर मौगी जीवन स हारि रहल अछि। अर्थात सुलभ क सहायता मात्र कलावती कए किया? किया ने ओहि राशि कए पूरा गाम मे बांटि देल जाए, जाहि स मात्र कलावतीक नहि बल्कि ओकरा संग-संग आओर मौगीक जीवन बदलि सकैत अछि। एक प्रकार स देखल जाए त सुलभक मदद कलावती कए ओ तमाम मौगीक सामने नकारात्मक छवि बनेबा मे मदद पहुंचेलक अछि। आइ कलावती पर आरोप लागि रहल अछि जे अपन जीवन सुधरलाक बाद ओ अनका बिसरी गेलीह। सुलभक मदद कलावती कए अपने लोक क कतार स अलग करि देलक। एक तरहे इ मदद कलावतीक लेल गलाक घेघ बनि गेल अछि। ओ अपने समाज मे अलग-थलग भ गेलीह। एहन मे अपना सन आओर मौगीक लेल हुनक प्रयास कए गलत नहि कहल जा सकैत अछि। सुलभ कए कोनो हक नहि छैक जे कलावती कए अमीर बना कए हुनका सामाजिक तौर पर अपने समाज स अलग-थलग करि देल जाए। एहि स त नीक रहत जे थोड़-थोड़ टका पूरा गामक ‘कलावतीÓ मे बांटल जाए, जाहि स कलावतीक चिंता क निराकरण क संग-संग पूरा गाम मे आर्थिक समरसता कायम भ सकत। सुलभ परिवार आ विशेष तौर पर विंदेश्वर पाठक कए एहि पर विचार करबाक अनुरोध करब जे हुनकर मदद मात्र कलावती क लेल भेला स ओहि गाम मे जीवन स हारि रहल आओर मौगीक लेल ‘त्रासदीÓ त अछि ये कलावतीक लेल सेहो एकटा दंड समान भ गेल अछि। ताहि लेल कलावतीक चिंताक कए देखैत ओ अपन मदद कए ओहि गाम लेल देबाक घोषणा करथि। जाहि स ओहि गाम मे सामाजिक तौर पर अलग-थलग भ चुकल कलावती एक बेर फेर समाजक अंग बनि सकथि आ हुनका पर लागल स्वार्थीक कलंक सेहो मिटा सके।

नीक वा अधलाह - ज़रूर कहू जे मोन होय

comments