समानता क अदभुत उदाहरण अछि छठ

सुनील कुमार झा
देखल जाइत अछि जे दुनिया उगैत सूर्य कए पहिने प्रणाम करैत अछि, मुदा बिहार मे पहिने डूबैत सूर्य कए प्रणाम करबाक प्रथा अछि, किया त जे डूबैत अछि अगिला दिन ओकर उगब निश्चित अछि। बिहार क लोकआस्था स जुड़ल पर्व “छठ” क पहिल अर्घ नहाय खाय क संग शुरू भ गेल।

दुनिया क सबस कठिन वर्त – चारि दिनक इ व्रत दुनिया क सबस कठिन व्रत मानल जाइत अछि। सूचिता क पर्व पवित्रता क एकटा मिशाल अछि। नहाय-खाय स लकए भोरका अर्घ तक व्रती पूरा निष्ठा क पालन करैत छथि। भगवान् भास्कर कए 36 घंटा क निर्जल व्रत स सब कए धन, धान्य, समृधि आदि भेटैत अछि।
नहाय खाय – 17 नवंबर ( एहि दिन व्रती कद्दू(सजमनि) क तरकारी, चने(बूट) क दाल, आ अरवा चाउर क भात खाइत छथि।)
खरना – 18 नवंबर ( दिनभरि उपवास राखि कए सांझखन व्रती खीर-रोटी खाइत छथि, एकर बाद 36 घंटा क उपवास शुरू भ जाइत अछि।)
संध्या अर्घ – 19 नवंबर ( जल मे ठार भ बिना कोनो मंत्रोच्‍चार कए अस्ताचलगामी सूर्य कए अर्घ देल जाइत अछि।)
प्रातः अर्घ – 20 नवंबर ( उदयीमान सूर्य कए अर्घ क संग लोक आस्था क महापर्व छठ क समापन।)

सामूहिकता क प्रतीक – सामूहिकता क मामला में इ पर्व अपना आप मे असगर अछि। एहन पर्व दुनिया मे शायद नहि भेटत। एहि मे नहि केवल आस्था स सबस ऊपर रहैत अछि बल्कि धर्म आ जाति क कोनो भेदभाव नहि देखाइत अछि। एक संग समूह मे जल मे ठार भ भगवान् भाष्कर क अर्चना सब भेदभाव कए मिटा दैत अछि। के ब्राहमण के दलित सब एक कतार मे ठार भ अर्घ दैत अछि। तहिना के अमीर आ के गरीब सब एक समान जल स अर्घ दैत अछि। के बौक के मुंहगर, के अनपढ, के शिक्षित सब लेल इ पर्व एक समान अछि। नहि कोनो पोथी आ नहि कोनो मंत्र। आडंबर करबाक प्रयास तक एहि पर्व मे दोष क भागी बना दैत अछि। जाहि प्रकार भगवान् आदित्य अपन प्रकाश देबा में कोनो भेदभाव नहि रखैत छथि तहिना हुनक भक्‍त क बीच सेहो कोनो भेदभाव नहि रहैत अछि। सूर्य क रोशनी लेल महल आ झोपडी मे कोनो अंतर नहि होइत अछि तहिना छठ क प्रसाद मे अमीर आ गरीब क अंतर देखार नहि होइत अछि। सच मायने मे छठ एकटा लोक पर्व छी। जाहि मे समाजक हर तबका क लोग एक संग ठार होइत अछि।

आस्था क नाम पर भ रहल व्यापार – छठ पर्व क त्यौहार अंग देश स शुरू भेल छल, एहि कारण स एहि पूजा मे अंग मे पैदा होइवाला फल आ सामग्री क विशिष्ठता रहैत अछि, जेना गन्ना(कुसियार), नेबो, सिंघार आदि। इ सब चीज अंग क्षेत्र मे प्रचुर मात्र मे भेटैत अछि। तहिना दलित क घर बनल बांस आ माटिक सामान अनिवार्य रूप से एहि मे उपयोग कैल जाइत अछि। मुदा बाजारवाद क कारण छठ अपन मूल भावना स हटल जा रहल अछि आ एकर स्‍वरूप बदलल जा रहल अछि। लोक एहि पर्व क आत्‍मा कए मारि आडंबर मे विश्‍वास कए रहल अछि। देसी खुसबू स दूर होइत इ पर्व पूर्ण रूप स ग्लोबलाइजेशन क भेंट चढ़ल जा रहल अछि। दलित त भागीदारी कए खत्‍म करैत लोक बांस क सूप क जगह पीतल, ताम्बा, सोने आ चांदी क सूप क प्रयोग करैत अछि। फल क सेहो रंग बदलि गेल अछि, अंग क फसलक जगह काजू बादाम ल लेलक अछि। सूचिता आ आस्था क इ त्यौहार फैशन आ अंतर्राष्ट्रीय बाजार क कारण सादगी क बदला मे आइ रौनक पूर्ण भ गेल अछि। छठि क घाट पर अमीरी आ गरीबी देखार भ रहल अछि आ बहुत ठाम त जातिभेद देखेबा लेल पुरहित सेहो ठार भ जाइत छथि। कुल मिला कए छठि क जे सबस पैघ आ महत्‍वपूर्ण पक्ष अछि ओ नष्‍ट भ रहल अछि। एकरा बचेबाक जरूरत अछि, नहि त छठि छठि नहि रहत, केवल नाम रहि जाएत आ आत्‍मा खत्‍म भ जाएत।

जखन औरंगजेब सेहो बदलि देलक फैसला – औरंगाबाद जिला क देव सूर्य मंदिर छठ लेल बहुत प्रसिद्ध अछि। कहल जाइत अछि जे मुग़ल शासक औरंगजेब जखन मंदिर कए नष्‍ट करबाक क्रम मे देव पहुंचल त एहि मंदिर कए सेहो तोडबाक आदेश देलक। मुदा भक्‍तसब एकरा नहि तोडबाक अनुरोध केलक। लोक एकर मान्यता आ शक्ति क संबंध मे औरंगजेब कए जानकारी देलक। एहि पर औरंगजेब कहलक जे अगर काल्हि भोर त एहि मंदिर क पट पूरब स पश्चिम दिस भ जाएत त हम मानि लेब जे सूर्य मे शक्ति अछि आ अगर एहन नहि भेल त मंदिर तोडि देब। कहल जाइत अछि जे अगिला भोर जखन देल गेल त मंदिर क द्वार पूर्व क बदला मे पश्चिम मे छल। इ देखकए औरंगजेब एहि मंदिर कए तोडबाक आदेश वापस ल लेलथि।
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