बेर कालक गीतक संरक्षण क एकटा प्रयास

पुरैनिया । एक दिस जतऽ युग-परिवर्तनक संग सांस्कृतिक बदलाव स्वाभविक छैक ओतऽ इहो सत्य छैक जे हरेक संस्कृति अपन पारंपरिक संरक्षणक प्रति निष्ठावान रहल अछि । बंगाली एखनहुं विवाहक अवसर पर अपन पारंपरिक कोढ़िलाक मुकुट पहिरब नहि बिसरलाह, पंजाबी लोकनिक बरियाती-सरियाती गुलाबी रंगक पगड़ी पहिरब नहि बिसरैत छथि, तखन मैथिल-जन किएक पाग पहिरै मे हिचकिचाइत छथि? बंगाली प्रत्येक शुभ बेला मे एखनहुं उल्लूक ध्वनि करैत छथि, पंजाबी भांगड़ा नचैत छथि, तखन मैथिल-महिला किएक गोसाउनीक गीत गबैक प्रति उदासीन भेल जा रहल छथि? एहि भावना सों प्रेरित भ श्रीमति भारती झा अपन पुस्तक ‘मिथिलाक बिध-बाध-गीत-नाद’ के माध्यम सों सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति के संकलन करवाक सफल प्रयास केने छथि. छठीयार से ल के विवाह-द्विरागमन तक प्रत्येक शुभ अवसर पर होई बला विधि-व्यवहारक वर्णन आओर निर्देश एतेक सरलता स केने छथि जे अबै बला समय में ई पुस्तक हरेक परंपरा-प्रेमी मैथिलक गृह मे एकटा डाइरेक्टरीक रूप मे स्थान पाबि, मांगलिक अवसर पर अपन उपयोगिता सॅ अवगत करबैत रहत। आजुक समय मे श्री मति भारती झाक एहि पुस्तकक आवश्यकता आओर अधिक अछि किएक त उत्तर-पश्चिमी भारतक सभ्यता प्रबल रूप सॅ सम्पूर्ण देशक संग मिथिलो पर प्रभावी भेल जा रहल अछि आओर विवाहक पूर्व सन्ध्या मे लाबा भुजाइक पारंपरिक विधि सॅ अधिक लोकप्रिय उत्तर-पश्चिमी भारतक संगीत आओर पाश्चात्य नृत्य भेल जा रहल अछि. आवश्यक अछि जे नवका तूरक लोक एखुनका सांस्कृतिक-मेलजोलक युग मे रहैत अपन परंपराक रक्षण करै मे सक्षम होथि। आइ जखन विश्वक हरेक कोन मे, प्रत्येक कार्य-क्षेत्र मे, झा-मिश्र-ठाकुरक उच्चपदस्थ सम्माननीय उपस्थिति, मिथिलाक परिचय दऽ रहल अछि, एहन उत्साह-वर्धक स्थिति मे, सीता-भामती-भारतीक वंशजा आओर वाचस्पति-विद्यापति-मण्डनक वंशज के अपन सांस्कृतिक परंपरा पर गौरव हेबाक चाही। श्रीमति भारती झा ‘ मिथिलाक विध-बाध गीत-नाद’ के माध्यम सों मांगलिक परंपरा के सहेज त देलनि , संगठित प्रयास सों एकर संरक्षण, प्रचार- प्रसार हेबाक चाही।

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