बीमारू नहि रहल बिहार

Harivansh-1एसोचेम परसर्च ब्यूरोक रिपोर्ट क अनुसार बिहार 100 फीसदीक विकासक संग आगू बढि़ रहल अछि

इ आलेख उत्तर भारतक एकटा एहन संपादकक छी, जे पिछला कई साल स विकसित बिहारक सपना देखि रहल छथि। प्रभात खबरक प्रधान संपादक श्री हरिवंश जीक इ आलेख पिछला मास ‘प्रभात-खबरÓ मे छपल छल। बिहार कए बीमारू राज्यक कतार स अलग देखबाक सुख की हाइत छैक, इ कोनो बिहारी 48 साल बाद महसूस केलक अछि। बिहारक चिंता केनिहार एहि वरिष्ठ पत्रकारक मूल चिंता एहि गति कए बरकरार रखबाक अछि। आइ सबहक मन मे इ आशंका घर केने अछि जे विकासक गति अगर बरकरार नहि रहल त बिहार फेर ओहि कतार मे जा सकैत अछि। इ आशंका एतबा प्रबल अछि जे दिल्ली आ पटनाक कोनो अखबार या समाचार चैनल ऐसोचेमक एहि रिपोर्ट कए एहि रूप मे प्रकाशित नहि केलक। ककरो ओहि पर जेना विश्वासे नहि भेल। अगर विश्वास भेल त आशंका प्रबल रहल जे बिहार फेर ओहि कतार मे चल जाइत। मुदा इ आलेख एकटा एहन आशावादी पत्रकारक छी, जे बिहार के आगू बढ़ैत मात्र देखि नहि रहल अछि, बल्कि ओ एकरा आगू बढ़ैबा लेल जन-मानस कए सेहो तैयार कए रहल अछि।
छह दशक मे पहिल बेर बिहार कए बीमारू राज्य स बाहर मानल गेल। इ निष्कर्ष कोनो साधारण व्यक्ति या संस्था क नहि अछि। ई एसोचेम परसर्च ब्यूरो द्वारा तैयार रपट अछि। एकरा तैयार केलथि अछि नुसरत अहमद आ एसोचेम परसर्च ब्यूरो मिल कए। इ परपोर्ट अछि ‘एसोचेम इन्वेस्टमेंट मीटरÓ (एसोचेम निवेश सूची)। परपोर्ट क नीचा उल्लेख अछि, शिफ्टिंग इनवेस्टमेंट डेस्टीनेशंस (निवेश क बदलते गंतव्य)। इ एक तिमाही क निवेश पैटर्न (पद्धति) क आकलन अछि। अगर हम सचेत नहि रहलहुं, हड़ताल, बंद, अव्यवस्था जइसन चीज चलैत रहल, त इ पैटर्न, अगिला तिमाही मे बदलि सकैत अछि। बिहार, फेर बीमा ब्रैकेट मे रहय लागत। इ चेंज एकटा अवसर अछि, अपन नियति बदलबाक । इ निवेश आंकड़ा फ्रेजाइल (अस्थिर) तत्व अछि। अगर हम जी-जान स अपन तकदीर संवारबा मे लागी, त इ स्थायी सेहो बनि सकैत अछि। एसोचेम क निष्कर्ष वित्तीय वर्ष 2008-09 क तेसर तिमाही क अछि। एहि लेल इ संकेत भरि (फ्रेजाइल) अछि। अगर इ स्थिति लगातार बनल रहल, त बिहार बीमारू ब्रैकेट (समूह) स बाहर निकलि जाइत। एसोचेम क एहि परपार्ट क सारांश अछि जे वर्ष 2008-09 क तेसर तिमाही मे केवल चारिटा राज्य पोजिटिव ग्रोथ (सकारात्मक प्रगति) केलक अछि। एहिमे राजस्थान, पहिल स्थान पर अछि, 245 फीसदी क संग। बिहार दोसर नंबर पर अछि, 100 फीसदी क संग। फेर पंजाब (41.6 फ़ीसदी) आ उत्तरप्रदेश (26.8 फ़ीसदी) अछि। परपोर्ट मे इ सेहो उल्लेख अछि जे बुनियादी संरचना स रहित राज्य बिहार पिछला वित्तीय वर्ष (2007-08) क तेसर तिमाही तक कॉरपोरेट निवेश कए आकर्षित नहि कए पाबि रहल छल, मुदा राज्य सरकार क विकासोन्मुख प्रयास क कारण, भारतीय उद्योगपति शिक्षा, आइटी आदि क्षेत्र मे 304 करोड़ क आसपास राशि चालू वित्तीय वर्ष क तेसर तिमाही मे निवेश करबाक तैयारी मे अछि। इ परपोर्ट आ निष्कर्ष अपने आप मे बिहार क लेल गौरव क विषय हेबाक चाही। पहिल बेर बिहार कए बीमारू नहि कहबाक गप, अपने आप मे प्रेरक अछि। जश्न और उत्सव क विषय अछि। बिहार बदलि सकैत अछि, बिहार बढि़ सकैत अछि आ बिहार विकसित भ सकैत अछि। कम स कम एकर झलक त भेटल। दरअसल बिहार क खिलाफ़ महाराष्ट्र और असम मे भ रहल आंदोलन क रचनात्मक जवाब बिहार क इ विकास अछि। भारत कए संदेश देब, अपन रचनात्मक काज स इ साबित करब जे हम सेहो बढि़ सकैत छी। विकसित भ सकैत छी, इ बिहार क जवाब हेबाक चाही। दुनिया क जे मुल्क आइ प्रगति क सीढ़ी पर सबस आगू ठार अछि, ओकर अतीत देखू। जे लोक अत्यंत विपरीत परस्थिति मे सफलता क चोटी पर पहुंच कए यश अर्जित केलथि अछि, हुनकर इतिहास पलटू। रामायण क प्रसंग मन पारू, जखन हनुमानजी कए इ अहसास कराउल गेल जे हुनकर क्षमता की अछि, ओ केना समुद्र लांघि सकैत छथि। एहन अनंत प्रकरण अछि। एहि सबमे कॉमन फैक्टर (समान कारक) एकटा अछि । ओ अछि, मोटिवेशन (प्रेरणा)। ‘हम होंगे कामयाबÓ गाना क मर्म की अछि? जाहि स देश क इतिहास बदलल, निजी जिनगी मे विश्वास आ आस्था भरल। नव बाट देखेलक। एहि लेल बिहार आ बिहारी कए एहि निष्कर्ष कए गहराई स बुझबाक चाहि । नव पहल क कोशिश करबाक चाही। बिहार बीमारू क घेरा स निकलि सकैत अछि, लगभग चारि दशक मे इ पहिल बेर साबित भेल अछि। इ घटना बिहारी कए रोमांचित करे, नव उड़ान क लेल ऊर्जा भरे, नव उत्साह स लोक अपन कर्म मे लगथि, इ हेबाक चाही। एहि स्थिति क बुनियादी श्रेय नीतीश कुमार क सरकार कए अछि। मुदा एकटा महत्वपूर्ण घटना बिहार मे भ रहल अछि, जाहि पर बिहारी कए गौर करबाक चाही। ओ घटना की अछि? इ कंपटीटिव पॉलिटिक्स (स्पर्धात्मक राजनीति) क दौर अछि। बिहार क राजनीति क एजेंडा आब विकास बनि गेल अछि आ बिहार क तीनू पैघ नेता लालूजी, रामविलासजी आ नीतीशजी पिछला कुछेक वर्ष मे बिहार क विकास क जेतबा प्रयास केलथि अछि, ओकरा एक ठाम जोडि़ कए देखबाक चाही। लालूजी जेतबा रेलक क्षेत्र में बिहार कए देलथि। रामविलासजी बरौनी मे कारखाना खुलबेलथि। बेतिया कए पहिल स्टील सिटीक दर्जा भेटल। एहि सबहक असर भविष्य मे देखल जाइत। नीतीश कुमार बिहार क राजनीति क एजेंडा बदलि देलथि अछि। विकास आब नारा या मुद्दा नहि भूख अछि। एसोचेम क परपोर्ट कए गहराई स देखू, त स्पष्ट होइत जे नीतीश सरकार बिहार कए एजुकेशनल हब बनेबाक जे कोशिश केलक अछि, ओकर सुखद परिणाम केना देखबा मे आबि रहल अछि। एसोचेम क परपोर्ट कअनुसार निवेश मे विकास क दृष्टि स चारि टॉप स्टेट (एहि वित्तीय वर्ष क तिमाही मे) अछि। ओहि मे बिहार दोसर नंबर पर अछि। जे झारखंड खनिज संपदा क दृष्टि स दुनिया क सबस महत्वपूर्ण क्षेत्र मे मानल जाइत अछि, ओकर की दुर्गति अछि? ओहि ठाम निवेश मे -98.78 फीसदी क गिरावट क स्थिति अछि। यह झारखंड अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 मे, देश मे पांचम स्थान पर छल। मुदा एकर दुर्गति कए, एहि ठामक मंत्री क लूट, भ्रष्टाचार स जोडि़ कए देखू, त तसवीर साफ भ जाइत। आब झारखंड पांचम स खिसक कए 15म पर पहुंच गेल अछि। जखन कि बिहार, अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 मे 21म स्थान पर छल, आब बिहार 2008-09 (अक्तूबर-दिसंबर) मे 14म स्थान पर पहुंच गेल। जखन बिहार बंटल, त इ गीत काफी लोकप्रिय भेल छल, बिहार क लोक बालू फांकताह। आइ ओ बिहार कतय आ कौन स्थिति मे अछि। जखन कि ओ गीत सुनी कए गदगद भ रहल खनिज संपदा स भरपूर झारखंड क की दुर्दशा है! इ राजनीतिक नेतृत्व क फर्क अछि। मुदा सबस कठिन आ मौलिक यक्ष प्रश्न अछि जे की बिहारी बदलय चाहैत छथि? किया कि बिहार कए बदलबाक अछि, त बिहारी कए बदलल पड़त। आत्मसम्मान क लेल. अपन प्रतिभा आ श्रम क लेल। अपन दुनिया बेहतर आ समृद्ध बनेबा लेल आ ओकरा संवारबा लेल। पिछला दू-तीन दशक स मशहूर अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और समाजविज्ञानी डॉ शैबाल गुप्ता आ आद्री, बिहारी उपराष्टीयता क गप करैत रहल छथि। एकरा यथार्थ मे मात्र बिहारी उतारि सकैत अछि। जीवन मे ढालि सकैत अछि। बिल गेट्स एक ठाम कहने छथि, ‘..चीनीक बाद दक्षिण भारतीय, दुनिया मे ‘स्मार्टेस्टÓ लोक छथिÓ। की इ चुनौती बिहार रचनात्मक ढंग स स्वीकार नहि करि सकैत अछि? बिहार क युवा प्रतिभा आ श्रम मे ककरो स कम अछि। गांधीजी कहने छलाह, काज स्वत बजैत अछि। की हम अपन आचरण आ काज स दुनिया आ देश मे अपन छाप नहि छोडि़ सकैत छी? की हम स्वत आगू बढि़ कए बिहार मे सामाजिक बदलाव आ विषमता दूर करबाक माहौल नहि बना सकैत छी? अंतत: राज्य समृद्ध होइत, विकसित होइत, तखने बिहार गरीबी क अभिशाप स आ बीमारू राज्य क अभिशाप स मुक्त होइत। इ पैघ घटना अछि जे बिहार क राजनीतिक एजेंडा बदलि गेल अछि। एहि ठाम राजनीतिक एजेंडा आब विकास अछि, मुदा अंतत: हर बिहारी कए एकरा आचरण मे तब्दील करबाक अछि। जात-पात छोडि़ कए, अत्यंत पिछड़ा, दलित, महिला आ गरीब कए प्राथमिकता क आधार पर आगू आनि कए। अगर इ जनमानस बनि जाए आ संग मे विकास राजनीतिक एजेंडा बनल रहे, त बिहार छलांग लगा सकैत अछि। देश आ दुनिया कए बाट देखा सकैत अछि। मुदा एकरा लेल सरकार आ समाज दूनू कए कठोर डेग क लेल तैयार रहय पड़त। बिहार मे 30 दिन स हड़ताल चलि रहल छल। की इ सरकारी कर्मचारी कहियो बिहार क बारे मे सोचैत छथि? बिहार क कुल आबादी अछि 9.72 करोड़। राज्य सरकार क कुल कर्मचारी छथि 3.5 लाख। हड़ताल पर छलथि, लगभग 2.5 लाख। राज्य सरकार क सबटा कर्मचारी कए परिवार समेत जोड़ दी, त इ संख्या दो फीसदी क आसपास अछि। मुदा हिनकर वेतन आ भत्ता पर खर्च अछि, सकल घरेलू उत्पाद क 10 फीसदी। इ विषमता! तइयो कर्मचारी हड़ताल पर! बिहार क प्रतिव्यक्ति आय अछि, 481 टका। गरीबी रेखा स नीचा क आबादी अछि, लगभग 5 करोड़ 65 लाख। जखनकि सरकारी महकमा मे तीसर आ चारिम पायदान पर काज कनिहार क मासिक आय 11000 स 20000 टका। इ सरकारी कर्मचारी नव युग क सामंत, जमींदार आ राजा छथि। इ संगठित क्षेत्र क लोक छथि। प्रतिवर्ष योजना व्यय, जाहि पर राज्य क विकास निर्भर अछि, साढ़े नौ करोड़ लोक क भविष्य निर्भर अछि, जे 13500 करोड़ अछि। मुइा आबादी क दू फीसदी लोक क वेतन आ पेंशन मद पर 16000 करोड़ खर्च! भारत मे संगठित क्षेत्र केना असंगठित लोक पर जुल्म करि रहल अछि, ओकर इ एकटा नमूना अछि। बिहार छठम वेतनमान लागू केलक अछि। मुदा सूचना अछि जे पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। विकसित आ धनी राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक आ आंध्रप्रदेश सेहो छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब सेहो छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। जे राज्य सबस धनी मानल जाइत अछि, प्रतिव्यक्ति आमद मे सेहो सबसे ऊपर मानल जाइत अछि, ओइ महाराष्ट्र- गुजरात मे सेहो छठम वेतनमान लागू नहि भेल अछि। मुदा बिहार सरकार क कर्मचारी छठम वेतनमान लागू होएबाक बादो हड़ताल पर छलाह। इ बिहार क विकास चाहैत छथि या विनाश? एहिने आचरण क कारण बिहार बीमारू बनल रहबा लेल अभिशप्त छल। बिहार बीमार रहल, त बिहारी अवसर क तलाश मे दर-दर भटकैत रहल, अपमानित होइत रहल। एहिना मे हम बिहारीये बिहारी क अपमान क मूल मे छी। राज ठाकरे त बाह्य कारण अछि। कर्मचारी संघ क नेता एहि विषमता क केना जवाब देताह? इ बुझब आओर रोचक अछि। इ कर्मचारी नेता आइएएस अफसर आ मंत्री क वेतन वृद्धि आ सुविधा क उद्धरण द कए अपन मांग कए जायज साबित करय चाहैत छथि। हेबाक त इ चाहि जे इ मजदूर नेता कहैत जे हमारे वेतन आ पेंशन मद पर खर्च घटाउ। नेता आ मंत्री पर खर्च घटाउ आ बिहार क असंगठित क्षेत्र क लोक क विकास पर खर्च करू, ताकि बिहार बढ़े, बिहारी नहि भटकैथि। बिहारी कए राज ठाकरे स अपमानित नहि हुए पड़े। सरकारी कर्मचारी पर श्वतखोरी के खिलाफ अभियान चलितय। बिहार क विकास कए गप करितथि, त एकटा नव गप होइत। राज ठाकरे को माकूल जवाब भेटत। देश आ दुनिया कए बाट देखा सकैत अछि। मुदा एकरा लेल सरकार आ समाज दूनू कए कठोर डेग क लेल तैयार रहय पड़त। बिहार मे 30 दिन स हड़ताल चलि रहल छल। की इ सरकारी कर्मचारी कहियो बिहार क बारे मे सोचैत छथि? बिहार क कुल आबादी अछि 9.72 करोड़। राज्य सरकार क कुल कर्मचारी छथि 3.5 लाख। हड़ताल पर छलथि, लगभग 2.5 लाख। राज्य सरकार क सबटा कर्मचारी कए परिवार समेत जोड़ दी, त इ संख्या दो फीसदी क आसपास अछि। मुदा हिनकर वेतन आ भत्ता पर खर्च अछि, सकल घरेलू उत्पाद क 10 फीसदी। इ विषमता! तइयो कर्मचारी हड़ताल पर! बिहार क प्रतिव्यक्ति आय अछि, 481 टका। गरीबी रेखा स नीचा क आबादी अछि, लगभग 5 करोड़ 65 लाख। जखनकि सरकारी महकमा मे तीसर आ चारिम पायदान पर काज कनिहार क मासिक आय 11000 स 20000 टका। इ सरकारी कर्मचारी नव युग क सामंत, जमींदार आ राजा छथि। इ संगठित क्षेत्र क लोक छथि। प्रतिवर्ष योजना व्यय, जाहि पर राज्य क विकास निर्भर अछि, साढ़े नौ करोड़ लोक क भविष्य निर्भर अछि, जे 13500 करोड़ अछि। मुइा आबादी क दू फीसदी लोक क वेतन आ पेंशन मद पर 16000 करोड़ खर्च! भारत मे संगठित क्षेत्र केना असंगठित लोक पर जुल्म करि रहल अछि, ओकर इ एकटा नमूना अछि। बिहार छठम वेतनमान लागू केलक अछि। मुदा सूचना अछि जे पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। विकसित आ धनी राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक आ आंध्रप्रदेश सेहो छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब सेहो छठम वेतनमान लागू नहि केलक अछि। जे राज्य सबस धनी मानल जाइत अछि, प्रतिव्यक्ति आमद मे सेहो सबसे ऊपर मानल जाइत अछि, ओइ महाराष्ट्र- गुजरात मे सेहो छठम वेतनमान लागू नहि भेल अछि। मुदा बिहार सरकार क कर्मचारी छठम वेतनमान लागू होएबाक बादो हड़ताल पर छलाह। इ बिहार क विकास चाहैत छथि या विनाश? एहिने आचरण क कारण बिहार बीमारू बनल रहबा लेल अभिशप्त छल। बिहार बीमार रहल, त बिहारी अवसर क तलाश मे दर-दर भटकैत रहल, अपमानित होइत रहल। एहिना मे हम बिहारीये बिहारी क अपमान क मूल मे छी। राज ठाकरे त बाह्य कारण अछि। कर्मचारी संघ क नेता एहि विषमता क केना जवाब देताह? इ बुझब आओर रोचक अछि। इ कर्मचारी नेता आइएएस अफसर आ मंत्री क वेतन वृद्धि आ सुविधा क उद्धरण द कए अपन मांग कए जायज साबित करय चाहैत छथि। हेबाक त इ चाहि जे इ मजदूर नेता कहैत जे हमारे वेतन आ पेंशन मद पर खर्च घटाउ। नेता आ मंत्री पर खर्च घटाउ आ बिहार क असंगठित क्षेत्र क लोक क विकास पर खर्च करू, ताकि बिहार बढ़े, बिहारी नहि भटकैथि। बिहारी कए राज ठाकरे स अपमानित नहि हुए पड़े। सरकारी कर्मचारी पर श्वतखोरी के खिलाफ अभियान चलितय। बिहार क विकास कए गप करितथि, त एकटा नव गप होइत। राज ठाकरे को माकूल जवाब मिलता. बिहार विकसित होता. क्या आनेवाले 10 वषाब में बिहार को विकसित राज्यों की Þोणी में खड़ा देखना आत्मगौरव का विषय नहीं है? 1991 में भारत की अर्थनीति बदल गयी. इन बदली पपरस्थितियों में जिन राज्यों ने खुद को विकसित किया, वे आगे निकल गये. आज कर्नाटक 70,000 करोड़ का आइटी का कारोबार करता है और हिंदी राज्य? लगभग शून्य. इंडिया टूडे प्रतिवर्ष इंडिकस नाम की संस्था से राज्यों की माली हालत, विकास स्थिति या ओर्थक स्थिति पर सर्वे कराता है. इंडिकस के Ó90-Ó91 के ओर्थक सर्वे को याद करें, तो देश के सबसे पिड़े राज्यों में हिंदी राज्यों के साथ-साथ आंध्र भी था. वह भी वर्षो से अत्यंत पिड़ा था. अब काफी आगे है. शासन चाहे चंद्रबाबू नायडू का हो या कांग्रेस के राजशेखर रेड्डी का. आंध्र, राज्यों की विकास सीढ़ी में नीचे से लांग लगा कर ऊपर के ब्रैकेट में पहुंच गया. जानेमाने ब्रिटिश पत्रकार डेनियल लेक ने भारत पर किताब लिखी मंत्राज ऑफ चेंज (परपोर्टिग इंडिया इन ए टाइम ऑफ फ्लक्स). वर्ष 2005 में पेंग्विन/विकिंग ने इसेोपा. उस पुस्तक में बीमारू राज्यों पर एक बड़ा अध्याय है, ब्रेकफास्ट विथ बोस. प्रो आशीष बोस भारत सरकार के डेमोग्राफर इन चीफ रहे हैं. बीमारू अवधारणा के भी जनक और भाष्यकार. उसी डॉ बोस ने डेनियल लेक से बीमारू अवधारणा पर लंबी बातचीत की. 80 के दशक के मध्य में यह अवधारणा उन्होंने विकसित की. डेनियल लेक ने लिखा है कि भारत से बीमारू राज्यों को अलग कर दें (शब्द है, इंडिया माइनस बीमारू, भारत – बीमारू = मध्य वर्ग का देश), तो भारत विकास और अर्थव्यवस्था में मध्य Þोणी का देश बन जायेगा. बीमारू राज्यों के साथ भारत गरीब है. दुनिया के संदर्भ में भारत को देखें, तो सबसे नीचे के पायदानवाले देशों में इन्हीं बीमारू राज्यों के कारण भारत शुमार होता है. अन्य सभी राज्यों को धकेल कर पीे खींच लेते हैं. डेनियल लेक ने कहा है कि ये राज्य विकास के सभी सूचकांकों पर भारत के अन्य राज्यों से पिड़े और पीे हैं. जनसंख्या वृद्धि यहां अनियोजित है. भारत के आधे अशिक्षित यहां रहते हैं. औरतों के मामले में सबसे खराब हैं ये. इनमें सबसे बुरी स्थिति में हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश, जहां भारत की 1/5वीं जनसंख्या रहती है. यहां भयानक हिंसा है. लोगों का आपस में विभाजन है. घोर जातिप्रथा है. कुशासन है. आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा, दक्षिण भारत में विकास के इशू पर जाति व्यवस्था अप्रभावी हो गयी है. पर बीमारू, खास तौर से उत्तरप्रदेश और बिहार में यह स्थिति बदतर हुई है. जातिवादी नेता अत्यंत सीमित जनाधार बनाते हैं. औरतों की उपेक्षा करते हैं. इसलिए इनकी यह स्थिति है. 1991 में ही राजस्थान और मध्यप्रदेश बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकल रहे थे. प्रो आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कु समय पहले आये थे. उन्होंने मुझसे कहा, आंकड़े देखिए, मध्यप्रदेश में चीजें बेहतर हो रही हैं. विकास हो रहा है. इसलिए अब हमारे राज्य को बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकालें. बिहार व अन्य ऐसे बीमारू राज्यों के बारे में इस पुस्तक में लंबा वर्णन है. उसी डेनियल लेक ने वर्ष 2008 में नयी पुस्तक लिखी, इंडिया एक्सप्रेस (द फ्यूचर ऑफ ए न्यू सुपर पावर). यह भी पेंग्विन/ विकिंग नेोपी है. यह ताजा किताब है. इस पुस्तक में भी लगभग 10 पन्ने बीमारू प्रसंग में हैं. वह कहते हैं कि इंडियन डेमोग्राफी और सांख्यिकी विेषण के आधार पर डॉ आशीष बोस का सबसे बड़ा अवदान है, बीमारू राज्य की अवधारणा. 80 के दशक में जब प्रो बोस सेंसस के पुराने आंकड़ों का विेषण कर रहे थे, तो उन्होंने पाया कि बीमारू राज्य विकास के सभी मापदंडों पर सबसे पीे थे. मसलन शिक्षा, मातृ मृत्यु दर, जन्म दर, बाल मृत्यु दर, प्रति वर्गमील डॉक्टरों की उपस्थिति वगैरह. पर सबसे खतरनाक संकेत था कि भारत के अन्य राज्यों के लिए यह सूचकांक लगातार बेहतर हो रहे थे, विकास हो रहा था. पर बीमारू राज्य के लिए या तो इन आंकड़ों में (प्रगति) ठहराव आ गया था या वे और बदतर हो रहे थे. प्रो बोस ने बीमारू राज्यों को सब-सहारा अफ्रीका बास्केट केस माना था. महिलाओं और बच्चों की बदतर स्थिति इन राज्यों में थी. इस अवधारणा के बाद बीमारू राज्य के राजनीतिज्ञों ने प्रो बोस की कटु आलोचना की. निंदा की. पर उनकी अवधारणा सही थी. डेनियल लेक इस किताब को लिखने के संदर्भ में बिहार भी आये. वह बिहार के गांवों में गये. जहानाबाद की ओर. उनकी यात्रा जहानाबाद में जेल तोडऩे के कु रोज पहले हुई. वह बोध गया तक गये. नालंदा औैर राजगीर भी देखा. बिहार के संदर्भ में उनकी टिप्पणी-निष्कर्ष अत्यंत गंभीर, सटीक, पर बिहापरयों के झूठे अहं को ठेस पहुंचानेवाले भी हैं. एक जगह वे कहते हैं, बिहार का मुख्य विश्वविद्यालय पटना एक राजनीतिक मजाक था. हथियारबंदोत्रसंघों की जगह. भयभीत अध्यापक जो भय से डिग्री देते हैं. उनकी दृष्टि में बिहार आधुनिक भारत का शर्म है. वह यह भी कहते हैं, कभी प्राचीन बिहार भारत का बौद्धिक और ओर्थक पावरहाउस भी था. वह लिखते हैं कि गंगा के किनारे अच्ी तरह सिंचित होनेवाली उर्वर धरती में आज भी भारत के एक तिहाई लोग रहते हैं. पर आज इसके पवित्र जल के बावजूद यहां दुख, भ्रष्टाचार से ग्रस्त सम्मान व मर्यादा से वंचित जीवन है. वह प्राइमरी स्कूलों के बारे में टिप्पणी करते हैं. मानते हैं कि बिहार को बेहतर करने के लिए बहुत कु किया जाना है और तत्काल किया जाना है. क्या हम बिहारी सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे बिहार को ोड़ देंगे? क्या बिहार गढऩे में जनता की हिस्सेदारी नहीं होगी? हम कब बिहार को एक नयी ऊंचाई पर ले जाने की भूख और भावना से प्रेपरत होंगे? कितने अपमान के बाद? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े और फाइनेंसियल टाइम्स के जानेमाने पत्रकार एडवर्ड लूस ने भी भारत के संदर्भ में चर्चित पुस्तक लिखी. इंस्पाइट ऑफ द गॉड (द स्ट-ेंज राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया). वर्ष 2006 में यह पुस्तक पी. ग्रेट ब्रिटेन के प्रकाशक लिटिल ब्राउन ने इसेोपा. इस पुस्तक में भी बिहार की चर्चा है. वह कहते हैं कि बिहार उत्तर भारत का सबसे गरीब राज्य है. वे बिहार की घूसखोरी और कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. स्कूलों में बिजली न होने, अध्यापक न होने और बाथम न होने की चर्चा करते हैं. लूस ने भी बिहार की यात्रा की. वह हैदराबाद से सीधे पटना पहुंचे थे. वह दोनों राज्यों का बहुत जीवंत तुलनात्मक चित्रण करते हैं. बोपरंग रोड का उल्लेख करते हैं कि कैसे एक ब्रिटिश अफसर के नाम पर इसका नाम पड़ा. फिर बिहार की कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. वह लालू प्रसाद और राबड़ी जी से भी मिले. बिहार के पिडऩे का उन्होंने अपनी पुस्तक में प्राय: उल्लेख किया है. भारत के विकास के संदर्भ में थॉमस एल फ्रिडमैन ने अपनी विश्व चर्चित किताब लिखी, द वर्ल्ड इज फ्लैट (ए ब्रीफ हिस्ट-ी ऑफ द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी). वर्ष 2005 में न्यूयार्क के फरार, स्ट-ॉस एंड गिरॉक्स ने इस पुस्तक कोोपा. मूलत: दक्षिण के राज्यों में आयी प्रगति व बदलाव के संदर्भ में यह पुस्तक है, पर बीमा राज्यों का इसमें जिक्र नहीं है.बिहार बदलने के लिए जरूरी है कि बिहारी बदलें. कोई सरकार या राजनीति एक सीमा तक विकास का माहौल उपलब्ध करा सकती है, पर बदलना खुद को पड़ेगा. क्या आज बिहार इसके लिए तैयार है?
बिहार विकसित होइत। की अबैयवाला 10 साल में बिहार कए विकसित राज्यक श्रेणाी मे ठार देखब आत्मगौरव क विषय नहि अछि ? 1991 मे भारत क अर्थनीति बदलि गेल। एहि बदलल परिस्थिति मे जे राज्य अपना कए विकसित केलक ,ओ आगू निकलि गेल। आइ कर्नाटक 70,000 करोड़ क आइटी क कारोबार करैत अछि आ हिंदी राज्य? लगभग शून्य। इंडिया टूडे प्रतिवर्ष इंडिकस नाम क संस्था स राज्य क माली हालत, विकासक स्थिति आ आर्थिक क स्थिति पर सर्वे करबैत अछि। इंडिकस क Ó90-Ó91 क सर्वे क मन पारू, त देश क सबस पिछड़ल राज्य मे हिंदी राज्य क संग-संग आंध्र सेहो छल। ओ येहो अत्यंत पिछड़ल छल। आब काफी आगू अछि। शासन चाहे चंद्रबाबू नायडू क हुए या कांग्रेस क राजशेखर रेड्डी क। आंध्र, राज्य क विकास सीढ़ी मे नीचा स छलांग लगा कए ऊपर क ब्रैकेट मे पहुंच गेल। जानल-मानल ब्रिटिश पत्रकार डेनियल लेक भारत पर किताब लिखलथि अछि मंत्राज ऑफ चेंज (परपोर्टिग इंडिया इन ए टाइम ऑफ फ्लक्स)। वर्ष 2005 मे पेंग्विन/विकिंग एकरा छपलक अछि। एहि पुस्तक मे बीमारू राज्य पर एक अध्याय अछि, ब्रेकफास्ट विथ बोस। प्रो आशीष बोस भारत सरकार क डेमोग्राफर इन चीफ रहल छथि। बीमारू अवधारणा क सेहो जनक आओर भाष्यकार। डॉ बोस डेनियल लेक स बीमारू अवधारणा पर लंबा गप केलथि अछि। 80 क दशक क मध्य मे इ अवधारणा ओ विकसित केलथि। डेनियल लेक लिखैत छथि जे भारत स बीमारू राज्य कए अलग करि दी (शब्द अछि, इंडिया माइनस बीमारू, भारत – बीमारू = मध्य वर्ग क देश), त भारत विकास और अर्थव्यवस्था मे मध्य वर्ग क देश बनि जाइत। बीमारू राज्य क संग भारत गरीब अछि। दुनिया क संदर्भ मे भारत कए देखू, त सबस नीचा पायदानवाला देश मे एकर बीमारू राज्य क कारण भारत शुमार होइत अछि। अन्य सब राज्य क धकेल कए पाछु खींच लैत अछि। डेनियल लेक कहैत छथि जे इ राज्य विकास क सबटा सूचकांक पर भारत क अन्य राज्य स पिछड़ल आ पाछु छथि। जनसंख्या वृद्धि एहि ठाम अनियोजित अछि। भारत क आधा अशिक्षित एहि ठाम रहैत छथि। मौगिक मामला मे सबसे खराब अछि। एहि ठाम सबस खराब स्थिति मौगिक अछि। बिहार आ उत्तरप्रदेश, जाहि ठाम भारत क 1/5म जनसंख्या रहैत अछि। ओहि ठाम भयानक हिंसा अछि। लोक अपने मे विभाजित अछि। घोर जातिप्रथा अछि। कुशासन अछि। आशीष बोस डेनियल लेक स कहलथि जे दक्षिण भारत मे विकास क मुद्दा पर जाति व्यवस्था अप्रभावी भ चुकल अछि। मुदा बीमारू, खास तौर स उत्तरप्रदेश आ बिहार मे इ स्थिति बदतर भ चुकल अछि। जातिवादी नेता अत्यंत सीमित जनाधार बनबैत छथि। मौगिक उपेक्षा करैत छथि। एहि लेल हिनकर इ स्थिति अछि। 1991 मे राजस्थान आ मध्यप्रदेश बीमारू ब्रैकेट स बाहर निकलि रहल छल। प्रो आशीष बोस डेनियल लेक स कहलथि जे मध्यप्रदेश क मुख्यमंत्री किछु दिन पहिने आयल छलाह। ओ कहला, आंकड़ा देखू , मध्यप्रदेश मे हालात बेहतर भ रहल अछि। विकास भ रहल अछि। एहि लेल आब हमर राज्य कए बीमारू ब्रैकेट स बाहर निकालू। बिहार आ अन्य एहन बीमारू राज्य क बारे मे एहि पुस्तक मे लंबा वर्णन अछि। डेनियल लेक वर्ष 2008 मे एकटा आओर पुस्तक लिखलथि, इंडिया एक्सप्रेस (द फ्यूचर ऑफ ए न्यू सुपर पावर)। इ सेहो पेंग्विन/ विकिंग छपलक। इ ताजा किताब छी। एहि पुस्तक मे सेहो लगभग 10 पन्ना बीमारू प्रसंग मे अछि। ओ कहैत छथि जे इंडियन डेमोग्राफी आ सांख्यिकी विशलेषण क आधार पर डॉ आशीष बोस क सबस पैघ अवदान अछि, बीमारू राज्य क अवधारणा। 80 क दशक मे जखन प्रो बोस सेंसस क पुरान आंकड़ा क विशलेषण करि रहल छलाह, त ओ पउलथि जे बीमारू राज्य विकास क सबटा मापदंड पर सबसे पाछु अछि। मसलन शिक्षा, मातृ मृत्यु दर, जन्म दर, बाल मृत्यु दर, प्रति वर्गमील डॉक्टरों क उपस्थिति आदि। मुदा सबस खतरनाक संकेत छल जे भारत क अन्य राज्य क लेल इ सूचकांक लगातार बेहतर भ रहल छल। विकास भ रहल छल। मुदा बीमारू राज्य क लेल या त इ आंकड़ा मे (प्रगति) ठहराव आबि गेल छल या वो आओर बदतर भ रहल छल। प्रो बोस बीमारू राज्य कए सब-सहारा अफ्रीका बास्केट केस मानैत छलाह। मौगी आ बच्चा क बदतर स्थिति एहि राज्य मे छल। इ अवधारणा क बाद बीमारू राज्य क राजनीतिज्ञ प्रो बोस क कटु आलोचना केलथि। निंदा केलथि, मुदा हुनकर अवधारणा सही छल। डेनियल लेक एहि किताब कए लिखबाक संदर्भ मे बिहार सेहो एलाह। ओ बिहार क गाम सेहो गेलाह। जहानाबाद । हुनकर यात्रा जहानाबाद मे जेल तोड़बाक किछु दिन पहिने भेल छल। ओ बोध गया तक गेलाह। नालंदा आ राजगीर सेहो देखलाह। बिहार क संदर्भ मे हुनकर टिप्पणी-निष्कर्ष अत्यंत गंभीर, सटीक, मुदा बिहारी क झूठ अहं कउए ठेस पहुंचेबा वाला सेहो छल। एक ठाम ओ कहैत छथि, बिहार क मुख्य विश्वविद्यालय पटना एकटा राजनीतिक मजाक अछि। हथियारबंदोत्रसंघों क जगह अछि। भयभीत अध्यापक जे भय स डिग्री दैत छथि। हुनकर दृष्टि मे बिहार आधुनिक भारत क लाज छी। ओ इ तक कहैत छथि जे कहियो प्राचीन बिहार भारत क बौद्धिक आ आर्थिक पावरहाउस रहल होइत। ओ लिखैत छथि जे गंगा क कछैर मे नीक जेकां सिंचित होइवाली उर्वर धरती मे आइ सेेहो भारत क एक तिहाई लोग रहैत अछि, मुदा आइ एकर पवित्र जल क बावजूद एहि ठाम दुख, भ्रष्टाचार स ग्रस्त सम्मान आ मर्यादा स वंचित जीवन अछि। ओ प्राइमरी स्कूल क बारे मे टिप्पणी करैत छथि । मानैत छथि जे बिहार कए बेहतर करबा लेल बहुत किछु करबाक अछि आ तत्काल करबाक अछि। की हम बिहारी सिर्फ राजनीतिज्ञ क भरोसे बिहार कए छोडि़ देबा ? की बिहार गढ़बा मे जनता क हिस्सेदारी नहि होइत? हम कखन बिहार कए एकटा नव ऊंचाई पर ल जेबाक भूख आ भावना स प्रेरित होयब? केतबा अपमान क बाद? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी स पढ़ल आ फाइनेंसियल टाइम्स क जानल-मानल पत्रकार एडवर्ड लूस सेहो भारत क संदर्भ मे चर्चित पुस्तक लिखलथि अछि। इंस्पाइट ऑफ द गॉड (द स्टेंज राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया)। वर्ष 2006 मे इ पुस्तक पी ग्रेट ब्रिटेन क प्रकाशक लिटिल ब्राउन छपलक। एहि पुस्तक मे सेहो बिहार क चर्चा अछि। ओ कहैत छथि जे बिहार उत्तर भारत क सबसे गरीब राज्य अछि। ओ बिहार क घूसखोरी आ कुव्यवस्था क उल्लेख करैत छथि। स्कूल मे बिजली नहि, अध्यापक नहि आ बाथरूम नहि होबाक चर्चा करैत छथि। लूस सेहो बिहार क यात्रा केलथि। ओ हैदराबाद स सीधा पटना पहुंचलाह। ओ दूनू राज्य क बहुत जीवंत तुलनात्मक चित्रण करैत छथि। बोपरंग रोड क उल्लेख करैत छथि जे केना एकटा ब्रिटिश अफसर क नाम पर एकर नाम पड़ल। फिर बिहार क कुव्यवस्था क उल्लेख करैत छथि। ओ लालू आ राबड़ी स सेहो भेंट करैत छथि। भारत क विकास क संदर्भ मे थॉमस एल फ्रिडमैन अपन विश्व चर्चित किताब लिखलथि, द वर्ल्ड इज फ्लैट (ए ब्रीफ हिस्ट-ी ऑफ द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी)। वर्ष 2005 मे न्यूयार्क क फरार, स्टॉस एंड गिरॉक्स एहि पुस्तक कए छपलक। मूलत: दक्षिण क राज्य मे आइल प्रगति आ बदलाव क संदर्भ मे इ पुस्तक अछि, मुदा बीमारू राज्य क एहि मे जिक्र नहि अछि। बिहार बदलबा लेल जरूरी अछि जे बिहारी बदलय। कोनो सरकार या राजनीति एक सीमा तक विकास क माहौल उपलब्ध करा सकैत अछि, मुदा बदलय त अपने पड़त. की आइ बिहार एकरा लेलतैयार अछि?

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2 टिप्पणी

  1. बड्ड नीक प्रस्तुति। मोन प्रसन्न भए गेल।
    समाद मैथिलीक ऑनलाइन समाचारपत्रक रूप मे जे सेवा कए रहल अछि से
    लोकक मोनमे अंकित भए गेल अछि।

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