बिनु बेटी क कोना होएत लक्ष्मी पूजा

सुनील कुमार झा
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’। अर्थात जतए नारी क पूजा होइत अछि आहि ठाम देवता विराजैत छथि। मिथिला मे त लक्ष्‍मी बेटी क रूप मे जन्‍म लेने छथि आ बेटी लक्ष्‍मी रूपी मानल जाइत रहल अछि। मि‍थिला मे सांस्‍कृति क ह्रास एतबा भ गेल अछि जे आन समाज जेकां आइ मिथिला मे सेहो बेटी क महत्‍व कम भेल जा रहल अछि आ बेटा क लेल लोक बेटी संग भेदभाव शुरू क देलक अछि। बेटा-बेटी मे विभेद मिथिलाक नव संस्‍कृति अछि। बेटा जन्‍म पर तासा बजैत अछि, मुदा घर क आँगन मे बेटी क किलकारी लोक कए नीक नहि लगैत अछि। बेटी क जन्‍म पर घर मे पसरैत उदासी एक प्रकार स लक्ष्‍मी क अनादर कहल जा सकैत अछि। मिथिलाक इ नव संस्‍कार अभिशाप बनि चुकल अछि। आइ मैथ्रिल क घर पर चाहे आसमान स सोना किया नहि बरसैत होइन, मुदा “लक्ष्मी” माथ पर पैर राखि भागैत देखा रहल छथि। लक्ष्‍मीक बढैत उपेक्षाक कारण आइ मिथिला मे लक्ष्‍मी क आगमन त भ रहल अछि मुदा निवास नहि।
उत्तर बिहार खासकए बिहार मे दिवाली क तैयारी अमूमन दशहरा स शुरू भ जाइत अछि। घर क सफाई स ल कए रंगाई-पुताई सबटा काज होइत अछि। तरह-तरह क आयोजन क लक्ष्मी आ गणेश कए पूजा कैल जाइत अछि। हुनकर सवागत लेल मंत्रजाप कैल जाइत अछि जे लक्ष्मी आउ, हे गणेश जी आउ, हमर घर बिराजू। अहां हमर घर बसू। हमरा धन, धान्य आ समृधि प्रदान करू। मुदा पुरातन काल स चलैत आबि रहल इ परंपरा असरदार भ रहल अछि। देवी देवता आइ मैथिल क प्रार्थना सुनि रहल छथि। जखन घर क लक्ष्मी अर्थात बेटी उपेक्षा भ रहल हुए त माटी आ पाथर क मूर्ति क आराधना क फल केहन भेटत। जखन घर क लक्ष्मी उदास छथि त देवी लक्ष्मी कोना खुश भ सकैत छथि।
जी हाँ मिथिला आन समाज जेकां मिथिला मे सेहो बेटीक उपेक्षा दिन प्रति दिन बढल जा रहल अछि, मुदा मिथिला इ बिसरी जाइत अछि जे लक्ष्‍मी ओकर बेटी छथि आ इ सौभाग्‍य आन समाज कए नहि भेटल अछि। अवध में पुत्रवधु लक्ष्‍मी क दर्जा पबैत अछि, जखनकि मिथिला मे इ दर्जा बेटी कए भेटल अछि। मिथिला लेल बेटी क उपेक्षा सीधा लक्ष्‍मीक उपेक्षा अछि। बेटी क जन्‍म पर मिथिला मे मातम क परांपरा नव अछि। मिथिलाक संस्‍कृति मे बेटी क जन्‍म क अर्थ छल लख्‍मीक आगमन। मिथिला क संस्‍कृति मे बेटी लक्ष्मी क रूप होइत अछि। एहि ठाम बेटी कए लक्ष्मी या अन्नपूर्णा क दर्जा एहिना नहि देल जाइत अछि। एकरा लेल मिथिलाक स्त्री कठिन परिश्रम क माध्‍यम स तिनका-तिनका जोडि कए घर चलेबा मे महारथ रखैत छथि। मिथिला मे बेटी कए इ संस्‍कार सेहो देल जाइत रहल अछि जे एकटा सुखी स्त्री क अर्थ अछि जे ओकर सुखी परिवार हुए। गप चाहे नहियर क हुए या सासुर क बेटी क भूमिका मिथिला मे तय अछि।
समाज मे आबि रहल कुरीति आ अपसंस्‍कृति स मिथिला क पुरान संस्‍कृति आ मान्‍यता खत्‍म भेल जा रहल अछि। लक्ष्‍मी क आराधना करनिहार मिथिलाक समाज आइ माइक कोख में बेटी कए मारबाक काज क रहल अछि। लक्ष्‍मी कए अपन घर एबा स रोकि रहल अछि। आंकड़ा बता रहल अछि जे मिथिला में आब लक्ष्‍मी क इच्‍छा कम भेल जा रहल अछि। जेकर घर मे लक्ष्मी छथि ओहि ठाम ओ तिरस्कृत भ रहल छथि। मिथिला मे आब बेटी लक्ष्मी नहि कुल्टा, आ कुलाक्षिनी कहल जा रहल छथि। मिथिला मे बेटी टा नहि बल्कि महिला क प्रति नजरिया बदलि गेल अछि। समाज हुनका लाचार, अबला आ दया क दृष्टि स देखैत अछि। जखनकि धन, शक्ति आ बुद्धि क विभाग देवी लग अछि। आइ मिथिला मे दहेज रूपी दानव लक्ष्‍मी कए आंगन मे एबा स रोकि रहल अछि। दहेज क कारण लक्ष्मी नहि केवल समाज मे शोषित भ रहल छथि, बल्कि अपन घर मे सेहो तिरस्कृत भ रहल छथि। दहेज़ क लेल आगि मे झोंकल जा रहल छथि, इज्जत लेल मौत क घाट उतारल जा रहल छथि। भ्रूण हत्या क मामला मिथिला मे तेजी स बढी रहल अछि। एहन मे सवाल अछि जे आइ मै‍थिल कोन मुंह स लक्ष्‍मी क स्‍वागत लेल ढार छथि। घर मे लक्ष्मी क प्रवेश पर प्रतिबंध लगा लक्ष्‍मीक आवाहन क इ टिटमहा किया कैल जा रहल अछि। जखन लक्ष्‍मी क भ्रूण हत्‍या होएत त लक्ष्मी कोना अउतीह।
लक्ष्मी पूजा मिथिला लेल सही अर्थ मे बेटी क पूजा छी। अपन घर क बेटी क विकास मे अपन योगदान द, ओकर काज क सराहना क असल मायने मे लक्ष्मी क पूजा भ सकैत अछि। अपन घर क लक्ष्‍मी क हंसी स घर क सुख, समृधि, आ वैभव बढैत अछि। असल मे लक्ष्मी क पूजा कोनो माटीक मूर्ति कए पूजला स सार्थक नहि भ सकैत अछि, एकर पाछु क महात्‍म कए बुझब जरूरी अछि। त आउ एहि लक्ष्मी पूजा पर प्रण ली जे घर क लक्ष्‍मी क हंसी सुनब। देखू कोना अहांक घर मे धन-धान्य, वैभव, आ समृधि अबैत अछि।
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