छुतहा घैल मे देखा गेल दामिनी क दर्द

नई दिल्‍ली। रंगमंच पर सबदिन समाज क परछाई दिखाइत रहल अछि। मैथिली नाटक क समृद्धता क एकटा आर प्रमाण दिल्‍ली क श्रीराम सेंटर मे देखबा लेल भेटल। महेंद्र मलंगिया नाटय महोत्‍सवक दोसर दिन नाटक छुतहा घैल मे निर्देशक संजय चौधरी दिल्‍ली क दामिनी कए दर्द समेट नाटक कए वर्तमान स जोडबा मे पूर्णत: सफल रहलाह। नीक नाटकक सबस पैघ गुण होइत अछि ओकर समकालीन होएब आ छुतहा घैल एहि मे सफल रहल। छुतहा घैल स्त्री विमर्श क चित्रण अछि आ एहि मे अझुका समय क अनुसार दामिनी क दर्द देखा कए निर्देशक नाटक कए आओर आत्मिक बना देलथि। प्रख्‍यात रंगकर्मी किशोर केशव क अनुसार समय क अनुसार दृश्‍य आ संवाद मे परिवर्तन क संजय चौधरी कमाल क देलथि।
स्त्री क सामाजिक आ दयनीय स्थिति पर लिखल एहि नाटक क आजुक परिवेश मे ढालि निर्देशक संजय चौधरी एकरा आर बेहतरीन आ मनोरंजक बना देलथि। आधुनिक सामान जेना मोबाइल, लैपटॉप आदिक प्रयोग संगे एकर किछु संवाद जेना ग्रामपति बनल अनिल दास जखन कहलि‍थ “पोलिथिन त हमर राज्य मे प्रतिबंधित अछि एकरा समकालीन बनेबा मे सहायक रहल। हास्‍य-विनोद क बीच चलि रहल नाटकक बीच नटी बनल कल्पना मिश्रा क संवाद “स्त्री कवि क लेल फुल, भोगी क लेल मांस क लोथड़ा, योगी क लेल पापक खान, आ पति क लेल वंश वृद्धि क मशीन बनि क रहि जाएत अछि आ ओहियो हिनका बस मे ल जा कए बलात्कार कैल जाइत अछि।’ त पूरा प्रेक्षागृह मे सन्‍नाटा छा गेल। दामिनी क संग भेल अन्याय कए मंच स उल्‍लेख पूरा प्रेक्षागृह कए गंभीर क देलक। संजय चौधरी इ सिद्ध करबा मे सफल रहलाह जे समय क संग नाटक मे बदलाव क ओकर प्रासंगिता बढा दैत अछि।
ओना मिथिला क लोक चरित्र गोनू झा पर आधारित नाटक छुतहा घैल मे मुख्‍य रूप से ई देखाओल गेल अछि जे समाज मे स्त्रीक अहम भूमिका रहितो ओ मात्र भोगक वस्तु बनल अछि। नाटकक मुख्य पात्र मिथिलाक लोककथा मे अतुल्य नायक गोनू झा अपन बुद्धिमताक प्रमाण दैत स्‍त्री कए सोझ बाट स भुतला कए ओहि बाट पर ल गेलथि जतए स्त्रीक अपन वास्तविक अधिकारक आभास होइत अछि आ ओ ई मूल मंत्र सेहो ग्रहण करैत अछि जे नारी अपन मर्यादाक निर्वाह करैत अड़ब, लड़ब आ मरब सन बाट पर ज्‍यों चलत त ओकरो अपन जीवन अपन मर्जी स लेबाक अधिकार भेट सकैत अछि।
मिथिलांगन कए एहि प्रस्‍तुति कए दिल्ली क दर्शक बेर बेर देखला अछि आर एकर प्रशांसा केलथि अछि, मुदा एहि बेरक मंचन आन बेरक मंचन स हज़ार गुना बेहतर छल। प्रकाश क एहेन समायोजन, एतेक बेहतरीन प्रयोग शायद मैथिली क कोनो आन नाटक मे पहिने नहि देखायल छल। नट-नटी बनल केशव झा आर कल्पना मिश्रा नहि केवल जबरदस्त अभिनय केलथि, बल्कि बीच मे नाटक क उद्देश्य आ सार दर्शक क बुझबैत रहलथि। ओतहि भगत बनल शुभनारायण झा क चुटीला संवाद दर्शक कए उछलबा पर मजबूर कए देलथि। हिनकर मिथिलइया हिंदी क एक एक पांति पर दर्शक पेट पकडि क हँसबा पर मजबूर छल। शुभ नारायण मांजल कलाकार छथि आ दिन प्रतिदिन हिनकर अभिनय क परिपक्त्वा देखबा मे आबि रहल अछि। अंजली आर मुकेश दत्त क्रमशः कबूतरी देवी आ बेपारीलाल क किरदार मे अपन अभिनय क संग न्याय केलथि। शुरू स अंत धरि हिनकर दुलकि-दुलकि कए चलब लोकक मन मे कहारक छाप छोड़बा मे सफल रहल। ओतहि मास्टर अनुज कर्ण अपन बाल मुख आ अनुशासन स दर्शक कए मुग्ध केने रहलाह। राजेश कर्ण आ आन कलाकार सेहो गोनू झा आ विभिन्न रूप मे नीक अभिनय केलथि। अभिनेता क पूर्वाभ्यास क मेहनत एहि नाटक मे साफ़ देखार भेल। नाटक इ साबित करबा मे सफल भेल जे नारी अपन मर्यादाक निर्वाह करैत रहल अछि, मुदा अड़ब, लड़ब आ मरब क मूल मंत्र पर चलब ओकरा लेल एखनो मुश्किल अछि। ओकरा स्वतंत्र श्वास लेब एखनो समाज मे सपना अछि। कुल मिला कए एकटा बेहतरीन नाटक जेकर प्रकाश, संगीत आ अभिनय सबटा विलक्षण छल।
मंच संचालन क जिम्मा मैलोरंग रेपर्टरी क चीफ मुकेश झा केलथि। कर्यक्रम क अंत मे मुख्य अतिथि मुस्ताक काग मिथिलांगन क निर्देशक संजय झा कए मैलोरंग क स्मृति चिन्ह आ सब कलाकार कए प्रशस्ति प्रमाण पत्र देलथि। एहि अवसर पर श्री काग कहला जे भाषा क अपन वजूद होइत अछि। एकटा पुरान कहावत अछि जेकरा हम स्‍वीकार करैत छी जे कोनो समाज कए खत्‍म करबा लेल सबस पहिने ओकर संस्‍कृति आ भाषा कए खत्‍म कैल जाइत अछि, एहन मे अगर मैथिली संस्‍कृति आ भाषा एतबा मजबूती स देखा रहल अछि त इ विश्‍वास अछि जे एहि समाज कए किया खत्‍म नहि क सकैत अछि। कर्यक्रम क अंत मे मुकेश झा कल्हुका नाटक “ओकर आंगनक बारहमासा” क संग राष्ट्रपति क स्वागत क न्योत द दोसर दिनक कार्यक्रम समाप्ति क घोषणा केलथि।
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